ऋग्वेद

वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था -जन्म मूलक या कर्म मूलक-- ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरूषसूक्त में शुद्र शब्द आया है इससे इस बात की पुष्टि होती है कि आज से लगभग 1500-1000 ईसा पूर्व अर्थात ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ था। यह माना जाता है कि इस काल में समाज समतावादी था अर्थात समाज में छूआछूत का प्रचलन न

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ग्रंथ क्यों हैं और किस लिए

युवाओं के लिए धार्मिक ग्रंथ यानी वेद, पुराण, उपनिषद आदि एक अबूझ पहेली जैसे हैं। ये ग्रंथ क्यों हैं और किस लिए बनाए गए हैं, यह अधिकतर युवाओं की समझ से बाहर है। इन ग्रंथों की पारंपरिक शैली और कठिन भाषा के कारण इन्हें समझना और ज्यादा मुश्किल हो गया है। पुराणों में अधिकांश कहानियां प्रतीकात्मक हैं। अ

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