ऐसे रखी राखी की लाज

‘’वल्लाह ! बला की खूबसूरत है शहजादी रुपनगर की । नाम है चंचलकुमारी । चांद सा मुखड़ा, हिरनी सी ऑंखें, तोते जैसी नाक, कंचन-काया, काली नागिन सी लहराती लंबी लटे, मोती सी चमकती दंतावली, गजगामिनी, कद-काठी भरी-पूरी उन्नत उरोज । आलपनाह ! सब बेमिसाल, अद्वितीय,अनिंद्य, अपूर्व सर्वांग सुन्दरी है राजकुमारी । हरम की शोभा में चार चाँद लग जायेंगे उसके आने से हुजूर ।‘’ चाटुकार, चमचे मक्खन मार रहे थे म्लैंछापति औरंगजेब को । आलमगीरके मुख से लार टपकने लगी ।

कामातुर, क्रोधी क्रूर, आततायी औरंगजेब ने अपना दूत दौड़ा दिया दरबार-ए-रुपनगर पत्र सहित – ‘’चन्द्रमुखी चंचलकुमारी से निकाह कर मल्लिका-ए-हिन्दोस्तां बनाउंगा । ना कबूली तो कहर ढ़ा दूंगा’’
दरबार में सन्नाटा - सुनकर सन्न रह गये दरबारी क्षण भर । यद्यपि मारवाड़ का एक छोटा ही राज्य था। पर पराक्रम अतुलनीय था उसका । अपने अद्वितीय आन-बान-शान के लिये वैसे भी जगविख्यात होते ही है राजपूत । गर्दन कट जायेगी, लाशों से धरती पट जायेगी, खून के पनालें बह जायेंगे पर अपनी आन पर ऑंच नहीं आने देंगे । ऐसे ही लोगों को कहते हैं क्षत्रीय-राजपूत । रुपनगर के दरबार में उपस्थित सरदारों की क्रोधाग्नि भड़क उठी तत्काल तलवारें खिंच गई । सरासर इज्जत पर हमला था । राजपूती पौरुष को चुनौती थी । पर मुगलिया साम्राज्य से सामना सर्वनाश को बुलावा था । जबर्दस्त उत्तेजक चर्चाओं से भी संतोषजनक मार्ग निकलता न देख राजकन्या चंचल कुमारी ने खुद ही निर्णय ले लिया । उसने फूलों से सजायी चाँदी की थाल । रखी रोली अक्षत । बनाई चमचमाती सुंदर राखी । इस प्रकार अपनी प्यारी परम्परागत दास्तान स्मरण कराती, मुस्कुराती राखी सुशोभित हो गई सुगंधित पुष्पों के बीच । पत्र सहित राखी रवाना की राजकुमारी ने राणा राजसिंह मेवाड़ को – ‘’यवन सम्राट सिकंदर की पत्नी द्वारा प्रेषित राखी के बंधन में बंधकर पराक्रमी पंचनंद नरेश पोरस ने रण क्षेत्र में सिकंदर पर प्राणघातक प्रहार रोक लिया था । देवगुरु बृहस्पति व पत्नी शची के रक्षासूत्र में बंधे देवराज इन्द्र दैत्य दलन हेतु दौड़ पड़े थे । राखी की लाज रखने तो मुगल बादशाह हुमायूं भी बंग विजय अभियान छोड़ भागे चले आये थे । मैं भी यह राखी आपको भेज रही हूं । आज भी ‘राखी की लाज’ दांव पर है । औरंगजेब मुझे भ्रष्ट करना चाहता है । अपनी अस्मत लुटवाकर जिन्दा नहीं रह सकती । रक्षासूत्र की सौगंध आपको, मुझे अपनाकर मराजपूती आन की शान बनाये रखें ।‘’
राखी की लाज - पत्र पढ़कर सिसोदिया वंशावतार, मेवाड़ सूर्य राणा राजसिंह ने तुरंत योजना बनाई । तदनुसार रुपनगर से, औरंगजेब को गफलत में रखने हेतु शादी की सहमति सूचक पत्र भेज दिया गया। राणा ने बुलाया दरबार । किया आह्वान सब सरफरोश सरदारों का, कि ‘राखी की लाज’ खतरे में है । प्राणान्त प्रयन्त करना है बचाने की । रुपनगर की ओर बढ़ते मुगल वाहिनी को रोकने का कार्य सौंपा पराक्रमी नौजवान सरदार चूड़ावत को । और आनन-फानन में कूच किया रुपनगर राजसिंह ने राजकुमारी को ब्याहने । कुछ कालान्तर से कूच करती, धूम मचाती, शराब और शबाब में डूबती उतराती मुगल फौज उदयपुर के बगल से गुजरने लगी तभी बज गयी रणभेरी उदयपुर में । घोड़े कसने लगे । सज्जित होने गये । राजपूत वीरांगनाओं ने क्षात्र धर्मानुकूल अपने पतियों के कमर में बांधी तलवार । आरती उतारी । लगाया तिलक । दिया हवाला राजपूती आन का ‘पीठ न दिखाना रणभूमि में’ माताओं ने ममता का गला घोंटते हुए छाती पर पत्थर रखकर बिदा दी – ‘खबरदार ! माँ का दूध न लजाना गोद सूनी हो जाय, परवाह नहीं !! पर कोख को कलंक न लगाना, भाग मत जाना !!! ‘ चूड़ावत सरदार के सम्मुख समस्या थी । अभी कल ही तो हाड़ा रानी को दुल्हन बनाकर घर लाया था वह । रानी के हाथ की मेंहदी भी अभी नहीं उतरी थी। भरी जवानी में हाथ आया सप्तपदी का स्वर्गसुख स्वाहा करके धर्मयुध्द में कूदना पड़ेगा । न जाने युध्द में जीत होती है कि हार । मौत से भिड़ना है । यदि जीवित न आ सका तो? प्राण प्यारी रानी का क्या होगा? इसी उहापोह में वह विदा लेने पहुंचा रंगमहल ।

नहीं चाहिए कायर पति - रानी ताड़ गयी दुविधा अपने प्राणेश्वर की । तूफान खड़ा हो गया दिल में उसके । क्या मेरा पति पलायन कर जायेगा युध्द से? क्या कायर की अर्धागिंनी बनने का दुर्भाग्य जीवन भर झेलना पड़ेगा? क्या मैं कामांध पुरुष की कामक्रीड़ा हेतु खिलौना बन कर ही रह जाउंगी? नहीं ! नहीं ! कभी नहीं !! कैसी आशंका कर रही हो प्रिये? व्यक्ति पुरजा-पुरजा कट मरें, तबहुं न छोड़ें खेत । शपथ है भगवान एकलिंग की राखी की लाज रखने हेतु तुम्हारा यह पति, धरती आसमान एक कर देगा । औरंगजेब, चंचलकुमारी तो क्या, एक नन्ही सी कली को भी हाथ नहीं लगा सकेगा । बस, टीस केवल इतनी सी है कि दाम्पत्य सुखोपभोग के पूर्व ही युध्द क्षेत्र को प्रस्थान करना पड़ रहा है । प्रार्थना करो प्रभु से कि आसक्ति मुझे अपने आदर्श से नीचे न खींच ले

बज गई रणभेरी - निहाल हो गई हाड़ा रानी सगर्व सज्जित किया सरदार को उसने । केसरिया बाना पहना सरदार चूड़ावत ने शिरस्त्राण, हस्तत्राणट, पादत्राण और लौह कवचधारी योध्दा को ढाल और तलवार कसने में मदद किया अर्धागिंनी ने । नगाड़े और तुरही की आवाज सुन सरदार ने छलांग लगाई घोड़े पर और हवा से बांते करते सरपट दौड़ चला मैदाने जंग में । घमासान युध्द छिड़ गया । घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड़, रणभेरी की आवाज से आसमान फटने लगा । पूरे युध्दभूमि में तलवारों की खनखनाहट, भालों-बरछों की चमचमाहट, और तीरों की सनसनाहट से कानों के परदे फटने लगे । कायर बिना मारे मरने लगे, वीर दूने वेग से लड़ने लगे । परन्तु रह-रहकर सरदार चूड़ावत का मन रानी की याद में विचलित हो जाया करता था । दौड़ाया दूत उसने महल की ओर, और मँगवाया स्मृति-चिन्ह अपनी प्राणेश्वरी से । हाड़ा रानी समझ गई अपने काम मोहित पति को । उसने दूत से कहा - मैं तुम्हें एक स्मृति चिन्ह देतीहूं । ले जाओ उसे और कहना मेरा संदेश उन्हें - नाथ नश्वर शरीर के प्रति आसक्ति त्याग, अब तो रखो राखी की लाज ! और अंदर जाकर झट ले आयी एक थाल व तलवार । थाल रख दी दूत के हाथों में और ऐसी चलायी तलवार अपने गर्दन पर कि कटा सिर थाल में, धड़ धरती में सहमा-सहमा घबड़ाया-घबड़ाया, रोता-चिल्लाया दौड़ा वह अद्भुत, अमर स्मृति - चिन्ह लेकर ।
नंदकिशोर शुक्ल, बिलासपुर

बच्चों की दुनिया - प्रकल्प - दीपक दुबे

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