शूद्र द्वि जन्ह उपदेश दे ग्याना ।
मैली जनेउ लेहि कुशना॥
शुद्र महात्मा ब्राह्मणों को ज्ञान का उपदेश देता है और गले में जनेउ डाल कर दान लेते हैं ।
गुरु शिष्य अधिक अंध का लेखा
एक न सुनई एक न देखा ।
हरई शिष्य धन शोक न परई ॥
गुरु ज्ञान के अंधे है और शिष्य कानों से बहरे हैं गुरु शिष्य को उपदेश देते हैं तो शिष्य सुनता ही नहीं । गुरु शिष्य से धन लेता है परंतु शिष्य ज्ञान उपदेश से वंचित रह जाता है ।
वर्नाधम तेली कुम्हारा ।
स्वपठ की रात कौन कलवारा ।
आज कल जातपात का कोई महत्व नहीं रहा । तेली कुम्हार भील आदि सभी जाति के लोग सिर मुड़वा कर संन्यासी बन जाते हैं और देखा भी जाता है कि आज कल दंभी लोग भक्त महात्मा अपने पैरों के जल का चरणामृत पिला कर एवम जूठन खिलाकर अपना और लोगों का धर्म नष्ट कर देते हैं ऐसे दंभी महात्माओं से सदा सावधान रहना चाहिए ।
संत विशुध्द मिलहि परि तेही ।
चित वही राम कृपा करि जेही ॥
उंचे कुल के संत उसी को मिलते हैं जिस पर श्रीराम की कृपा हो जाती है अर्थात् भक्त विभीषण ने हनुमान जी से कहा था ।
अब मोहिया भरोसा हनुमंता ।
बितु हरि कृपा मिलही नहीं संता ॥
जब भगवान की दया से यह संयोग मनुष्यों को मिल जाते हैं फिर भी भगवान की भक्ति के बिना वंचित रह जाते हैं ।
जो न तेरे भवसागर तर समाज पाई ।
जो कृत विदिंक मंद मति,
आला हन गति जाई ॥
इस अनमोल मानव जीवन को पाकर संसार से मोह हटाकर तन-मन-धन से परमात्मा की प्राप्ति के लिए अधिक चेष्टा करनी चाहिए नहीं तो आगे चलकर घोर पश्चाताप करना ग्रहण करना पड़ेगा जीव ज्योंही भगवान की शरणा ग्रहण करता है उसके करोड़ों जन्मों के पाप कर्म सभी नष्ट हो जाते हैं । भगवान की शरणागति के बिना इस संसार सागर को पार करना अत्यंत कठिन है रामचरित मानस में भक्ति की विविध रुपों की व्याख्या की गई है ।
जब ही राम हृदय धरयो,
भयो पाप का नाश ।
मानो चिंगारी आग की,
परी पुरानी घास ॥
कैसा भी पापी क्यों न हो भगवान का नाम लेने से उसके पिछले सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । जैसे सुखी घास की अग्नि की
छोट ी चिंगारी भी भस्म कर देती हैं संसार एक अथाह सागर है इसके पार जाने के दो साधन है एक प्रभु प्रेम भक्ति की नौका द्वारा पार जाना दुसरा ज्ञान के द्वारा तैरकर जाना प्रभु की भक्ति के बिना संभव नहीं है । आज कल जिधर भी देखिए कबीर की सांखिया पढ़ कर तीर्थों की निन्दा करते हैं वह तीर्थों के जल को साधारण पानी मांगते हैं कितना अच्छा होता यदि ऐसे लोग कबीर की भांति शून्य महल के निवासी परमात्मा की खोज में लग जाते तो भारत के लिए उनका जीवन सफल साबित होता पर ऐसे बहुत कम लोग होते हैं।
- पं. रमेश त्रिपाठी नगर पंचायत मु पो पलारी
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