कविता----- बालकवि बैरागी

एक बात के लिये जो उम्र भर जिन्दा रहे
और वो भी ना मिले तो बहुत शर्मिन्दा रहे
उस दीप ऐ मैं कह रहा हूं इस तरह रोओ नहीं
अच्छी भली इस उम्र को इस तरह खोओ नहीं
स्नेह को साधे बिना धरती नहीं हिल पाएगी
आग को जिन्दा रखो सौ बााितयां मिल जाएंगी।
हर तरफ जब हो अंधेरा और सूरज पस्त हो
बाजार हो काजल भरे भाव से मदमस्त हो
आप बस इतना करे एक दीपक भर जला ले
फिर देखिए अंधा अंधेरा प्राण को कैसे बचा ले?
यह ना किसी की सादना है ना किसी की भक्ति है
आपके संकल्प की अद्भुत असीमा श्क्ति है
स्नेह जिसकी भूख हो, स्नेह जिसकी प्यास हो
एक बाती से मिलन जिसका प्रबल विश्वास हो
बस एक तीली की तड़प पर प्राण दे दे मर मिटे
पागल अंधेरे से लड़े उत्सर्ग व्रत से ना हटे
उस एक नन्हें दीप का हम पर बड़ा उपकार है
उजली दिवाली कुच नहीं आभार का त्यौहार है।

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