कवि प्रदीप - श्री रामचन्द्र दुबे

इस समय जब कवियों की बाढ़ सी आ गई है जिन्हें मंचो ंपर अपनी रचनाएं पढक़र बोलनी पड़़ती है । ऐसे मे इसी युग के एक कालजयी गीतों के रचनाकार याद आ रहे हैं। इन्होंने अंग्रेजों के शासनकाल में अप्रत्यक्ष रूप से पुरानी फिल्म किस्मत जो द्वितीय महायुद्द साठ साल पूर्व के समय रिलीज हुई थी उसका वह गीत दूर हटो ए दुनियां वालों हिन्दुस्तान हमारा है.. के रचनाकार थे। श्री रामचन्द्र दुबे जो प्रदीप जी गीतकार के नाम से चर्चित हुए ।
वर्तमान युग में स्वाधीनता के बाद भी प्रदीप जी के लिखे गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाए झांकी हिन्दुस्तान की ये धरती है बलिदान की.. साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.. समारोहों में सुनने को मिलते रहते हैं।
आज जब हमारे युवा गीतकार वातानुकूलित (एयरकण्डीशन) कमरों में गीतों पर लेखनी चलाते हों ऐसे में गीतकार प्रदीप जी के बहुचर्चित गीत ऐ मेरे वतन के लोगों जरा याद करो कुर्बानी लिखने की रोमांचकारी कहानी है. मुम्बई में फुटपाथ पर चलते हुए बापू जी (कवि प्रदीप) के मन में उपरोक्त गीत का मुखड़ा कौंधा। इस पंक्ति को तुरन्त लिखने के लिए वह इसलिये बेचैन हो गए कि कहीं भूल न जाए और उन्होंने वहीं रूककर एक पान वाले से सादा कागज और पेन मांग। पान वाले ने कहा कि कागज तो नहीं है सिगरेट की खाली डिब्बी है।
इस ऐतिहासिक चर्चित गीत की प्रारंभिक कहानी कवि प्रदीप की बेटी मितुल जी बताती है , बापू जी ने दुकान के पास ही खड़े एक सज्जन से पेन मांग कर उस गीत के मुखड़े खाली डिब्बों पर ये पंक्ति लिख ली। इस प्रकार चर्चित गीत लिखने की शुरूआत हुई। बाद में घर आकर उन्होंने अपनी कलम से गीत परा किया। ऐ मेरे वतन के लोगों...। गीत को पाश्र्व गायिका लता मंगेश्कर के स्वर मे सी.रामचन्द्र ने संगीतबद्ध किया । गीत सर्वप्रथम 27 जनवरी 1963 को दिल्ली में नेशनल स्टेडियम में लता मंगेशकर ने गाया। जरा आंख में भर लो पानी.. सुनकर तत्कालीन प्रधान मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की आंखे आंसू से डबडबा गई। इन भावपूर्ण क्षणों को देश के समाचार पत्रों ने सचित्र प्रकाशित किया था।
ऐ मेरे वतन के लोगों.. ऐसा गीत बन गया जो सीमा पर तैनात जवानों में आज भी जोश भरता है। जब भी कोई शहीद होता है यही गीत बजता है । मितुल जी बताती है लता जी ने प्रदीप जी को बताया था कि जब भी वह स्टेज शो पर जाती है तो उनसे इस गीत की खास फरमाइश की जाती है। लता जी को यह गीत इतना छू गया था कि उन्होंने गीत गाने के लिये एक भी पैसा नहीं लिया। इस चर्चित गीत गाने से मिलने वाली रायल्टी को सेना के फण्ड में दान कर दिया गया था।
काश वर्तमान पीढ़ी ऐसे गीत कार से कुछ प्रेरणा ले सके जो देश और समाज को अपनी लेखनी से चेतना प्रदान कर सके।
अभिनव तिवारी, खास बाजार कानपुर

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