तुलसीदास की जन्म भूमि कोई जनपद बांदा का राजापुर मानता है तो कोई एटा का सोरोग्राम, किन्तु तुलसीदास द्वारा रचित ग्रन्थों के आधार पर उनकी जन्मभूमि इन दोनों स्थानों में होना अमान्य कर देते हैं । राम कथा के प्रसंग में उन्होंने रामचरित मानस में कहा है मैं पुनि जिन गुर सन सुनी कथा सो सूकर खेत । समुझी नहिं तसि बालपन, तब अति रहेउ अचेत॥ इसका तात्पर्य यह है कि तुलसीदास ने अपने बालपन में, जब कि उनकी बुध्दि विकसित नहीं हुई थी कि वे रामकथा को सोच समझ सकते, सूकर क्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी । उनके गुरु रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्द जी, जिन्हें नरहरिदास भी कहा जाता था, सर्वमान्य है ।
पुराणों के अनुसार सूकर क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसमें विष्णु भगवान ने जल में डूबती हुई पृथ्वी को बाराह का रुप धारण कर पाताल लोक से उध्दार किया था । सूकर क्षेत्र का यह मुख्य स्थान गोण्डा जनपद (उ.प्र) में ‘’पसका’’ नामक ग्राम है जो सरयू और घाघरा नदियों के संगम पर परसपुर कस्बे से लगभग 6 कि.मी. की दूरी पर है । यहां बाराह भगवान का अति प्राचीन मंदिर है जहां पौष मास में प्रत्येक वर्ष एक बड़ा मेला लगता है । साधु - सन्त योगी तथा गृहस्थ सभी यहां ऐसे मेले के समय कल्पवास करते हैं । यहीं पर तुलसीदास ने गुरु श्री नरहर्यानन्द या नरहरिदास की कुटिया भी है जहां पर गोस्वामी जी की हस्तलिखित रामचरित मानस के कुछ पृष्ठ मौजूद है । तुलसी की माता हुलसी द्वारा अनिष्ट की आशंका से दशमी की रात्रि में, दासी चुनिया के साथ उन्हें दासी की ससुराल भेजकर दूसरे दिन स्वयं इस असार-संसार से चल बसना, तुलसी दास के 5 वर्ष का होते ही चुनिया का भी देहान्त, तुलसी को अनाथ बना गया । किन्तु बालक तुलसी को नरहरिदास के आश्रम में शरण मिल गई । उन्होंने इन का नाम रामबोला रखा । इनका यज्ञोपवीत इनके गुरु द्वारा अयोध्या में हुआ । बांदा अथवा एटा जनपद में पैदा हुए अनाथ बालक का अपने आप सूकर क्षेत्र में पहुंच जाना सम्भव नहीं लगता । छोटे-छोटे बालकों के गुरु उनके ग्राम के निवास करने वाले ही व्यक्ति होते है । तुलसी के बालपन के गुरु नरहरिदास थे । जिन्होंने उन्हें छोटेपन में ही रामकथा सुनाया था । नरहरिदास की कुटिया का सूकर क्षेत्र के ‘’पसका’’ ग्राम में होना तुलसीदास की जन्मभूमि को उसके निकट सिध्द करन में में समर्थ है ।
पसका के निकटवर्ती ग्रामों में बहुत संख्या में सरयूपारी ब्राह्मण रहते हैं । पसका के निकट राजापुर नामक ग्राम भी है जहाँ पर सरयूपारी ब्राह्मण , विशेषकर दुबे आस्पद के ब्राह्मण रह रहे हैं । तुलसी के पिता श्री आत्माराम दुबे थे जो सरयूपारी ब्राह्मण थे । राजापुर के दुबे सरयूपारी ब्राह्मण अपने को तुलसीदास का वंशधर बताते हैं और कहते हैं कि उनके वंशधर वहां पर भगवान रामचन्द्र के समय से रह रहे हैं । तथा वे वहां के आदिवासी है । इसी प्रकार सरयू के दूसरी ओर राजापुर से थोड़ी दूर तुलसीदास की पत्नी रत्नावली का मैका भी है । यहां सरयूपारी ब्राह्मण अपने को रत्नावली का वंशज कहते हैं । राजापुर के ब्राह्मण रत्नावली के मैके के ग्राम की लड़कियां तो अपने लड़कों से ब्याह लेते हैं परन्तु अपनी लड़कियों का विवाह उस ग्राम में नहीं करते । उनका कहना है कि राजापुर ग्राम के ब्राह्मण रत्नावली के ग्राम के ब्राह्मणों से उच्च है ।
तुलसी रचित ग्रंथों में अवधी भाषा का ही प्रभुत्व है जो गोण्डा, बहराइच या घाघरा के उत्तर में बोली जाती है । अवधी भाषा का क्षेत्र बहुत बड़ा है किन्तु भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली अवधी में अंतर है । सीतापुर, लखीमपुर, लखनउ की अवधी, रायबरेली, उन्नाव, प्रतापगढ, सुल्तानपुर की अवधी, बांदा, हमीरपुर, इलाहाबाद, फतेहपुर की अवधी बोलियों में बड़ा अन्तर है । बांदा, हमीरपुर, इलाहाबाद, फतेहपुर की अवधी बोलियों में बड़ा अन्तर है । बांदा, हमीरपुर, इलाहाबाद, फतेहपुर की अवधी में बुंदेलखंडी भाषा के अनेकानेक शब्द होते हैं । तुलसीदास के ग्रन्थों में बुंदेलखंडी भाषा के शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ है । डा. भगवती सिंह ने अपने शोध ग्रन्थ में लिखा है कि तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में उन शब्दों का प्रयोग किया है जो मएलगिन बृजम के उत्तर अवधी भाषा में बोले जाते हैं । सारा रामचरित मानस तो ऐसी ही भाषा के शब्दों से भरा पड़ा है । मानस की हर चौपाई, ई तथा उ से अन्त होती है । जायसी का पद्मावत भी दोहा, चौपाईयों में अवधी भाषा में है परन्तु इसमें चौपाईयों का अन्त सीधे शब्दों से हुआ है । ऐसी अवधी भाषा, रायबरेली, उन्नाव, प्रतापगढ़ आदि जनपदों में बोली जाती है । लेखक या कवि पर उसकी आंचलिक भाषा का प्रभाव बना रहता है अत:वह जाने अनजाने अपनी आंचलिक भाषा के शब्दों का प्रयोग अपनी रचनाओं में कर लेता है । तुलसीदास भी इससे बचे नहीं रह सके और उन्होंने अपने ग्रन्थों में गोण्डा, बहराइच और घाघरा के उत्तर में बोली जाने वाली अवधी शब्दों का प्रयोग किया है । यदि तुलसीदास इस क्षेत्र में न होते तो वे इस क्षेत्र में बोली जाने वाली अवधी के इतने सटीक शब्दों का प्रयोग न कर पाते । लेखक कवि अथवा रचनाकर पर अपने परिवेश का प्रभाव पड़ना भी सर्वमान्य है । अस्तु तुलसीदास पर बांदा की बुंदेलखंडी अथवा एटा की बृजभाषा का प्रभाव नहीं पड़ा । उन पर प्रभावी है गोण्डा, बहराइच अथवा घाघरा के उत्तर की अवधी भाषा ।
घाघरा के उत्तर गोंडा, बहराइच में बोली जाने वाली अवधी की मुख्य पहिचान यह है कि कभी कोई शब्द सीधा नहीं बोला जाता है । जैसे खाना को खनवा, पानी को पनिया, गधे को गधोउ, घोड़े को घोड़उ घी को घिउ, भोजन को जेउना, सामूहिक भोजन को जयौनार, खाने के बाद मुंह धोने को अचवाना, लेटने को पौड़ना, सोने को सुतना, भाई को भयल, बहन को बहिनी, माँ को महतारी, बॉके जवान को छयल, लकड़ी के पाटे को पिढ़ई, बेलन को बिलना, ननिहाल को ननियाउर, निधड़क को निधरक, कांवारि, लहकौरि कलेवा आदि अनेक शब्द है जो तुलसी ग्रन्थों में बाहुल्य के साथ है । मखटानाम शब्द का प्रयोग प्राय: जूझना के अर्थ में किया जाता है लेकिन गोण्डा बहराइच में मखटानाम बहुत दिन तक रहने के अर्थ में बोला जाता है । तुलसीदास ने इस शब्द का प्रयोग गोंडा की भाषा में ममसहज एकाकिन्ह के भवन कबहूँ कि नारि खटाहिमम किया है ।
श्री राम का विवाह पढ़ते हुए लगता है कि विवाह अवध क्षेत्र के किसी ग्राम में हो रहा है । शगुन गीत, विवाह गीत, ज्योनार तथा कलेवा के समय की गारी, लड़की की विदाई के समय के करुणा भरी सीख गीत, सभी की भाषा और शब्द गोंडा में बोली जाने वाली अवधी के है । उनका ‘’रामलला नहछू’’ गोण्डा जनपद के पास का क्षेत्र तथा उसके निकटवर्ती ग्रामों का सटीक चित्रण करता है । - डॉ. शीतला प्रसाद द्विवेदी, रायबरेली
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