हरिद्वार में कुंभ मेले का योग कुंभ राशि में बृहस्पति ग्रह की उपस्थिति पर निर्भर करता है । जब सूर्य मेष राशि में विचरण करे और उसी दौरान बृहस्पति कुंभ राशि में आ जाए तो ऐसे दुर्लभ संयोग पर ही हरिद्वार में गंगा स्नान की परंपरा है । बृहस्पति ग्रह प्रत्येक राशि में लगभग एक वर्षतक विचरण करता है, इसलिए दोबारा कुंभ राशि तक पहुंचने में बृहस्पति को बारह वर्ष लग जाते हैं , तभी महाकुंभ मेले का आयोजन होता है । कहने का अर्थ है कि सूर्य, चंद्र और बृहस्पति की राशिगत स्थितियों के आधार पर ही कुंभ मेले की तिथि का पुर्वानुमान लगा लिया जाता है ।
कुंभ मेले के आयोजन से जुड़ी मान्यताओं के संदर्भ में रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, दुर्वासा ऋषि के श्राप से मुक्त होने और स्वयं को पुन: शक्तिशाली बनाने के लिए इंद्र और सभी देवताओं को अमृत की आवश्यकता हुई । इसके लिए उन्होंने दानवों को समुद्र मंथन के लिए राजी कर लिया । मंथन से उत्पन्न विभिन्न रत्नों के बाद जब अमृत भरा कुंभ निकला, तो देवताओं और दानवों में इसे प्राप्त करने के लिए युध्द हुआ ।इस छीना झपटी में कुंभ से अमृत छलककर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में गिरा। तभी से इन स्थानों को पवित्र मानकर यहां स्थित पावन नदियों के तट पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाने लगा ।
भारतीय उपमहाद्वीप में मनाए जाने वाले अनेक पर्वों में से महाकुंभ अपनी तरह का अकेला और विशिष्ट आस्था से जुड़ा स्नान पर्व है । इस अवसर पर हजारों की संख्या में स्त्री- पुरूष संयासी (साधु) अपने शरीर पर राख लगाए हुए मेले में सम्मिलित होते हैं । इसके साथ ही धार्मिक गोष्ठियों, सामूहिक भजन - कीर्तन का भी आयोजन व्यापक स्तर पर किया जाता है ।
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