ज्योति स्वरूप अग्निहोत्री

बन्दर बांट हो गया

जो राजस्व जहां से आया, उसका बन्दर बांट हो गया।
देसके पहेदारों ने ही, देश का बंटाढार कर दिया।
कागज पर योजना बन गई, कागज पर सब काम हो गये।
विज्ञापन विकास के नारे, अखबारों के शीर्ष बन गये।
सेवा की भावना मिट गई, राजनीति व्यापार हो गया
जो राजस्व....।

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