तुम्हारा यूं चले जाना

Late Shri Shailendra Sharma Chief Editor

सचमुच ईश्वर की इच्छा के आगे हम सब नतमस्तक हैं। इस दुनिया में जिसने जन्म लिया है उसे काल की खाई में समाना ही होगा। विधाता ने किसी की मृत्यु की तिथि देर से तय की है तो किसी की जल्दी। परन्तु मृत्यु अटल सत्य है। फिर भी हे भगवान, तूने शैलेन्द्र शर्मा को जल्दी ही अपने पास बुला लिया । शायद इसलिए कि ईश्वर को भी भले लोगों की जरुरत रहती है।
लेकिन हे परमेश्वर,तुम्हारे पास तो अच्छे लोगों की कमी नहीं होगी। कितने साधु-संत आपके पास ग्रह नक्षत्र व तारों के रुप में टिमटिमा रहे हैं। पृथ्वी लोक में तो ऐसे लोगों का घोर अभाव है। चिराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलते। देखों न पाप, अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, चोरी-डकैती, झूठ कितनी बढ़ गई है। इन करतूतों के बीच में एक भला इंसान शैलेन्द्र शर्मा अच्छाईयों व परोपकार का पताका उठाए हुए था उसे भी अपने लोक में बुला लिया। ओह, यह कैसा मनहूस दिन था।

आठ फरवरी की सुबह मैं हर सुबह की तरह अखबार पढऩे बैठा था। पन्ने पलटते हुए निधन कॉलम पर छपी एक जानी-पहचानी सी तस्वीर पर मेरी नजर पड़ी। मन ही मन सोचा कि यह तस्वीर शैलेन्द्र शर्मा की जैसी है। निधन समाचार पढ़ा। फिर भी मन यकीन करने को तैयार नहीं हुआ कि सचमुच में यह तस्वीर अपने शैलेन्द्र की है। क्योंकि इस दुनिया में हमशक्ल भी होते हैं। मुझे लगा कि नहीं यह अपने वाला शैलेन्द्र नहीं है बल्कि उससे मिलते-जुलते शक्ल वाला कोई और शैलेन्द्र है।

सच मानिए मेरे दिल ने यह यकीनी तौर पर मान लिया कि यह कोई और शैलेन्द्र है। मैं फिर अपने काम में रोज की तरह मशरुफ हो गया। मुझे यह भी नहीं पता था कि शैलेन्द्र शर्मा कब अम्बे मंदिर वाला छोटा सा मकान छोड़कर चंगोराभाठा में शिफ्ट हो गया था।

दूसरे दिन मेरी नजर मेरे मोबाइल के इन बॉक्स में पुराने एसएमएस पर पड़ी। जिसे मैं ओपन करके पढ़ नहीं पाया था। मैसेज अजय जैन ने भेजा था। इस मैसेज में शैलेन्द्र की मौत का उल्लेख था। मैं पढ़कर अचंभित रह गया था। सोचने लगा अरे ये कैसे हो गया । दो दिन पहले ही तो मेरी मुलाकात भले चंगे व मृदुभाषी शैलेन्द्र से हुई थी। हम जोश खरोश से मिले थे।
न कोई बीमारी और न ही देह में कोई और कष्ट। तनाव जैसी भी कोई बात उनके चेहरे में नजर नहीं आई थी. आखिर किसकी बुरी नजर लग गई मेरे मित्र को। यहां यह उल्लेख करना चाहूंगा कि अजय जैन जाति,धर्म,वर्ग से उठकर एक भला काम करते हैं। किसी की मौत की खबर किसी को देना लोग अच्छा नहीं मानते हैं लेकिन अजय भाई की सोच दूसरी है।

उनका मानना है जिनके घर में किसी का निधन हुआ हो तो उसके परिजनों को शोक में इस बात का होश नहीं रहता कि किस-किस परिचित को सूचना देनी है। और उस समय यही सबसे महत्वपूर्ण व बड़ा काम होता है। लिहाजा अजय जैन को मृत्यु की सूचना मिलती है तो वे सबसे पहले मृतक से संबंधित जितने लोगों को वे जानते हैं सबको एसएमएस कर देते हैं।

बहरहाल दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके सद्कार्यों की चर्चा उसके मृत्यु के बाद की जाती है। कुछ ऐसे होते हैं जो मृत्यु के बाद भी निंदा के पात्र होते हैं। शैलेन्द्र एक ऐसे व्यक्तित्व के मालिक थे जो जीते जी भी लोकप्रिय रहे और मृत्यु के बाद भी प्रशंसा के पात्र बने रहे। दरअसल उनका किसी से कोई बैर नहीं था। आकर्षक कद-काठी, सुंदर मुस्कुराता चेहरा, मधुरवाणी और अच्छे संस्कार यही पहचान थी शैलेन्द्र की।

मैंने उसे संघर्ष करते हुए देखा है जब वे अम्बा मंदिर परिसर में निर्मित छोटी सी कोठरी में रहते थे। तब मेरा वहां आना-जाना था। प्रधानमंत्री रोजगार योजना के अंतर्गत न जाने कितने बेरोजगारों को लोन दिलवाकर उन्होंने उनके आय का ोत खड़ा किया। स्वरोजगार का प्रशिक्षण भी उन्होंने वर्षों तक दिया । कई युवा शैलेन्द्र की बदौलत आज बड़े कारोबारी हो गए हैं।

उनको मैंने युवाओं की खातिर गर्मी की दुपहरी में सायकल से जिला उद्योग केन्द्र व बैंकों का चक्कर लगाते देखा है। सचमुच में आग में तपकर ही सोना खरा बनता है। शैलेन्द्र भी धूप,ईमानदारी व परोपकारी की तापिश में तपकर 24 कैरेट का खरा सोना बन गए थे। गरीब परिवार की विवाह योग्य कन्याओं के हाथ पीले करना भी उनका अभियान था। इसके लिए लोगों से सहयोग लेने में वे संकोच नहीं करते थे। कभी हम लोगों को बड़ी कोफ्त होती थी कि शैलेन्द्र भाई कहां इस चक्कर में पड़ गए हैं।

वे कहते थे अपने लिए तो सब जीते हैं दूसरों के लिए जीकर देखों बड़ा सुकून मिलता है। उनका कहना था कि जब आप अपने एक हाथ से किसी की मदद करते हैं तो तत्क्षण आपको मदद करने हजारों हाथ उठ जाते हैं। विप्र समाज के लिए वे समर्पित थे। ब्राम्हणों में बढ़ती नशाखोरी, मांसाहार को लेकर वे बेहद चिंतित रहा करते थे। दहेज व शादियों में अनावश्यक खर्च के घोर विरोधी थे।

राह चलते वे मुझे जब भी मिले दुआ-सलाम के बाद पूछने पर यही बताते थे फलां के काम से निकला हूं या विप्र वार्ता के प्रकाशन के लिए प्रबंध कर रहा हूं। गजब का समर्पण व ऊर्जा उनमें थी। विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। न जाने कितनी ही यादें है उनकी। शैलेन्द्र शर्मा भी इंसान ही थे। उनमें भी बुराइयां रही होगी लेकिन उनकी बुराई उनकी अच्छाईयों के सामने कहीं नजर नहीं आती है। आज वे हमारे बीच सशरीर नहीं है लेकिन वे दिल में इतने गहरे पैठ कर गए हैं कि उनको आज भी महसूस किया जा सकता है। लगता है कहीं से शैलेन्द्र आवाज दे रहे हैं 'प्रकाश भाई,जरा रुकना तो काम है।
भाभी संगीता, भतीजा स्वप्निल तथा भतीजियां साक्षी व समीक्षा के लिए उनकी यादें व कार्य हौसला का काम करेंगी। शैलेन्द्र का हम सबको इस तरह छोड़कर चले जाना बेहद कष्टप्रद है। दोस्त, तुम्हारी मृत्यु पर मैं तुम्हें श्रद्घांजलि बिलकुल भी नहीं दूंगा। क्योंकि मैं आज भी तुम्हें अपने आस-पास महसूस करता हूं।

Prakash Sharma
Tue, 03/22/2011 - 16:28
- पता - साईं मंदिर गली
ब्राम्हणपारा, रायपुर

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