तुलसीदास का वाग्विनोद

संसार की किसी भी भाषा में शायद ही कोई ऐसा कवि उत्पन्न हुआ हो जिसकी समानता तुलसीदास से की जा सके। तुलसीदास की कृतियों में इतनी विविधता है कि किसी भी रूचि का पाठक उससे अपार तृष्ति पा सकता है । महात्माओं को रामचरित मानस के समान दूसरा कोई आध्यात्मिक ग्रन्थ नहीं मिलता। भक्तों को उसके समान कोई भक्ति ग्रन्थ नहीं मिलता। साहित्यकारों को तो उसके समान शायद ही कोई दूसरा ऐसा ग्रन्थ मिले जिसमें नवो रसों का एकत्र समन्वय हो। वनस्पतिशास्त्री कहते हैं कि तुलसीदास ने वनस्पति विज्ञान का अद्भुत पाण्डित्य प्रदर्शित किया है।
प्रेम एवं कोमल प्रेमविलह का जैसा हृदयस्पर्शी चित्रण तुलसीदास की कृतियों में हुई है वैसा सम्भवत: किसी कवि की आज तक की प्रकाशित कृतियों में शायद ही हुआ हो। सच तो यह है कि एक तुसलीदास के मुख से सम्पूर्ण जड़ चेतन सृष्टि की सरस्वती मुकर हो उठी है ।
तुलसीदास का बावाङ्मय वर्णमालातीत है। व्यास, वाल्मीकि भास, कालिदास एवं अन्य कवियों तथा साहित्यकारों की रचनाओं का पाठ बिना पढ़े लिखे हम नहीं कर सकते, परंतु तुलसीदास के रामचरित मानस का प्रचार शिक्षितों अशिक्षितों में समान रूप से पाया जाता है । गांव के न जाने कितने अनपढ़ व्यक्तियों ने तुलसीदास की एक चौपाई के सहारे अपने जीवन को अमूल्य एवं साधु बना लिया है। अक्षरों की सीमा को लांगकर अमरता ्अर्पित करने वाला यदि कोई वाङ्मय है तो तुलसी वाङ्मय है।
तुलसीदास ने अपनी भाषा को विविध अलंकारों, हृदयस्पर्शी मुहावरों, भावों को सप्राण कर देने वाली कहावतों और रसमय शब्दों से ऐसा सजायाहै कि उनकी अद्वितीयता पर आश्चर्य होता है अवधि भाषा तो उन्हें पाकर धन्य हो उठी थी । कविर्मनीषीर परिभू: स्वयंभू के मूर्त प्राण होते हुए भी तुलसीदास शोध भी कम नहीं थे । उनका वाग्विलास असाधारण था । उपहास करने में उन्होंने न विष्णु को छोड़ा न ब्रह्मा को, न शिव को न इन्द्र को । इससे भी अधिक उनके स्वभाव का विनोद वहां खिल उठता है, जहां हम उन्हें अपने स्वाध्याय तपस्वियों को थोड़ी देर के लिये कौतूहल में डाल देने वाले दो अर्थों के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाते हैं । जान पड़ता है ऐसे शब्दों को चुन-चुन कर रखे रहते थे और जहां कुछ भाषा संबंधी कौतूहल अनुभव कहना चाहते थे, वहां उन्हें वे जड़ देते थे । उनके इस शब्द कौतूहल मे बहुत से टीकाकार फंस भी गए हैं, यह देखकर और भी आश्चर्य होता है उदाहरण स्वरूप कुछ शब्द लें ।
करहिं गान बहु तान तरंगा ।
बहु विधि क्रीडहि पानि पतंगा।।
इसमें पतंग शब्द का अर्थ किसी टीकाकार ने गुलाबी किसी ने सूर्याकार और किसी ने चिनगारी किया है और किसी ने यह लिखा है कि वे पतंग अर्थात नकौआ उड़ाती हुई नाच रही थी । सामान्यत: पतंग शब्द इन्हीं अर्थों में व्यवहहृत भी होता है, पर तुलसीदास ने यह शब्द गेंद के अर्थ में प्रयुक्त किया है और सम्भवत: उन्होंने इसे भागवत से लिया होगा । श्रीमद् भागवत में कई स्थानो ंपर यह शब्द गेंद के अर्थ में आया है । यहां बहुत से टीकाकारों को सरसीरूह सोना से सुनहले कमल को भ्रम हो गया है । पर यह सोना संस्कृत के शोण का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है लाल।
रामकथा कलि पन्नग भरनी।
पुन िविवेक पावक कहं अरनी ।।
टीकारारों ने भरनी का अर्थ भरणी नक्षत्र किया है और बहुतों ने अपनी यह जानकारी भी घोषित कर दी है कि भरनी नक्षत्र में सापं का नाश हो जाता है, यद्यपि कहा यह जाता है कि भरणी नक्षत्र मे ंही सांप अण्डे देता है । पर तुलसीदास ने यह शब्द मोरनी के अर्थ में प्रयुक्त किया है मोदिनी कोषकार ने कहा है
जे चरन सिव अज पूज्य रज शुभ, परसि मुनिपतिनी तरी।
नखनिर्गता मुनिबन्दिता, त्रैलोक पावनि सुरसरी ।।
ध्वज कुलसि अंकुस कंज जुत, बन फिरत कंटककिन लहे
पदकंज द्वंद मुकुन्द राम, रमेस नित्य भजामहे ।।
इसके तीसरे चरण में एक किन शब्द आया है उसने रामचरित मानस के कितने ही टीकाकारों को खूब छकाया है । कइयों ने इसका अर्थ किनने जिन्होनें या क्यों न किया है पर यह संस्कृत के किण शब्द का अपभ्रंश है। जिसका अर्थ है मट्ठा ।
संस्कृत मे ंइस शब्द का प्रयोग कई स्थानों में मिलता है पहले आलमन्दार स्तोत्र, फिर गीत गोविन्द के श्लोक, देखिए
शरासनज्याकिणकर्कशै: शुभै: चतुर्भिराजानुविलंबिभिर्भुजै:।
प्रियावतंसोत्पलकर्णभूषणै:, शलथालकाबन्धविमर्दशििसभि:।
एक स्थान पर चलि शब्द ने भी टीकाकारों को भ्रान्त किया है ।
सीतल सुरभि पवन बह मन्दा।
गुजंत अलि लइ चलि मकरन्दा
इसमे ंचलि शब्द ऐसे स्थान पर रख दिया गया है जहां वह क्रिया के समान जान पड़ता है । पर यह अर्थ करने पर कि भांरे मकरन्द लेकर गूंपते हुए चले जा रहे थे, यह शंका होती है कि कवि को क्या पता कि भौंरा खाली मुंह जा रहा है या मुंह में मकरन्द भर कर? भौरे को केवल गुंजन ही कवि का विषय है । यहां पर चलिमकरन्दा का अर्थ होगा, मकरन्द से लिया हुआ है । भौरे के शरीर पर पुष्प रस चुपड़ा हुआ है, वह लय से गुजंार कर रहा है. श्रीमद् भागवत में भी यह शब् इसी प्रकार प्रयुक्त हुआ है। चलत्पद्मरज: प्रभ: ।
इसी प्रकार का एक शब्द है सकल । तुसलीदास लिखते हैं
जहँ सुख सकल सकल दुख नाही।
संस्कृत में सकल का अर्थ होता है, खण्ड, जरा सा । अर्थ हुआ जहां सर्व सुख है पर दु:ख कुछ भी नहीं है । एक स्थान में इन्द्र के तिरस्कार करने क ेप्रसंग में तुलसीदास ने पाणिनि के एक सूत्र का अद्भुत प्रयोग किया है पाणिनि का एक सूत्र है शव्युवमघोनामतद्विते अर्थात श्व (कुत्ता), युवा और मघवा (इन्द्र) इन तीनों शब्दो ंके तद्वित भिन्न में समान रूप होते है ं। इन्द्र का तिरस्कार करना था । उसके लिए पाणिनि ने इस सूत्र का सुन्दर सा उपयोग कर लिया है हालांकि पाणिनि ने इन्छ को श्व (कुत्ते ) की श्रेणी में रखने के इरादे से उनका सूत्र नहीं लिखा था पर तुलसीदास ने पाणिनि के ही मुख से इन्द्र का तिरस्कार कराकर अपने रचना चातुर्य का अद्भुत परिचय दिया है ।
लखि हिअँ हँसि कह कृपानिधानू
सरसि स्वान मघवान जुबानू .।
तुलसीदास ने इसी प्रकार नर नारी का विचित्र प्रयोग किया है ।
विपुल भूपति सदसि महँ। नर नारि कह्यो प्रभुपांिह
साधारणत: नर नारी का लोक प्रचलित अर्थ स्त्री पुरूष है । पर यहां नर से तुलसीदास का अ्भिप्रया अर्जुन से है। अर्जुन और श्रीकृष्ण क्रमश: नर और नारायम कहे जाते हैं, अतएव नर नारी का अर्थ हुआ द्रौपदी । यह शब्द केवल साहित्यिक मनोरंजन के लिए ही यहां रख दिया गया है।
तुलसीदास ने संस्कृत शब्दो ंके प्रयोग से ही ऐसा चमत्कार उत्पनॅन किया है ऐसी बात नहीं है । बोलियों के शब्दो ंको लेकर भी उन्होंने पाठकों को चकित करने के लिे अनेक प्रयोग किये है एक शब्द है बनी
जनक बाम दिसि सोह सुनप्रना ।
हिमगिरि संग बनी जनु मयना।
टीकाकारों ने इस चौपाई मे ंआये हुए बनी शब्द पर ध्यान नहीं दिया । यह अचानक यहां नहीं आ पड़ा है , बल्कि इसको यहां बैठाने में तुलसीदास की साािहत्यप्रियता कारण हुई है । बनी का अर्थ हिन्दी में बनी हुई और सुशोभित होता है। पर राजपूताने मे ंदूल्हे को बना ौर दूलहिन को बनी कहते हैं। अवश्य ही इस शब्द का प्रयोग दुलहिन के अर्थ में यहां किया गया है । इसी प्रकार अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास ने एक बाहेर शब्द का प्रयोग किया है लोक वेद बाहेर सब भांती ।
बाहर अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है रोशन, जाहिर प्रकट आािद । तुलसीदास ने अवश्य ही इसी अर्थ में इसका प्रयोग किया है . बाहर का अर्त हम बहिष्कृत मान लेंगे, तो उचित न होगा, क्योंकि केवट वेद के बाहर हो सकता है लोक के नहीं । तुलसी वाङमय का अक्षर अक्षर मन्त्र है। तुलसीदास महान शब्द शास्त्री थे । वस्तुत: तुसली को पाकर मानव जाति धन्य हुई है । भूत, वर्तमान और भविष्य में ऐसी वर्चस्विनी परतिभा शायद ही सम्भाव्य हो।

मनोरमा त्रिपाठी

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