तुलसी और साहित्य

विश्व प्रसिद्ध एवं पूज्य महान महाकाव्य श्री राम चरित मानस विश्व साहित्य की सर्वोत्तम कृति है। गोस्वामी जील ने इसकी रचना करते समय अनेक प्रकारकी बातों को ध्यान में रखा होगा। उदाहरणार्थ शब्द योजना । गोस्वामी जी ने अनेक शब्द मानस में इस प्रकार से रखे कि उनका वास्तविक अर्थ एवं गोस्वामी जी का उद्देश्य जानने के लिए अन्य शास्त्रों का भी प्रारंभिक अध्ययन आवश्यक होता हैा। सम्पूर्ण भारत की गौरवपूर्ण संस्कृति के स्थापित मान्यता प्राप्त ग्रंथों को प्रारंभिक रूप से पढ़ा व समझा व्यक्ति ही श्रीराम चरित मानस के अध्ययन का , पूर्ण अधिकारी हो सकता है । अथवा गोस्वामी जी का उद्देश्य यह भी रहा हो कि मेरी कृति के पाठ करने वाले को सर्वप्रतम पूर्ण भारतीय होना चाहिए । एक पूर्ण भारतीय की कल्पना करेक गोस्वामी जी ने अपना सम्पूर्ण साहित्य रचा। वेद शास्त्र,पुराण, ज्योतिष, आयुर्वेद, संगीत, व्याकरण, भूगोल, इतिहास, गणित, आदि भारतीय विधाओं का प्रारंभिक अध्ययन ठीक उसी प्रकार गोस्वामी जी आवश्यक मानते थे जैसे आज के दून के छात्रों के लिे आवश्यक माना जाता है। वह भी आज केवल प्रारंभिक ज्ञान तक ही सीमित है क्योंकि शेष ज्ञान अंग्रेजी भाषा में प्राप्त किया जाता है ।
अरनि, अलम, साबर बरोरू कोपर, भरनी, बाजा, अंबक, दिंगचल, कांस, अगस्त्य कांरवा सोती, मनेब निबुकी, नाकनटी, राय, मुनिखांगे धंधक, धींग सुपेती, डाबर ब्याज, फराक, सोहनी, पदिक, आदि कई शब्द इसप्रकार के हैं कि उनका अर्थ या पूर्ण भाव जानने के लिए अनेक शब्द कोषों का आश्रय लिया जाता है ।
उपर्युक्त शब्दावली में भरनी शब्द एक ऐसा शब्द है जिसका प्रामाणिक अर्थ जानने के लिए ज्यतिष तन्त्र शास्त्र, समाजशास्त्र एवं साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक होगा। भरनी एक नक्षत्र भी है। भरनी एक जलचर जीव भी है। भरनी एक गीत भी है। भरनी एक मंत्र भी है. भरनी एक पक्षी भी है । भरन एक साहित्यिक उपमा भी है। गोस्वामी जी ने किस अर्थ के अभिप्राय से इसका उपयोग मानस में किया है ? इसका उत्तर जानना आज के पाठक के लिए अत्यन्त आवश्यक है । इसी तरह के अनेको शब्द श्री राम चरित मानस में है। आज उनका तात्विक भावार्थ जानने केलिए मानस पर ही शंका कुशंका का प्रश्न प्रतिपश्न आदि की झडिय़ां लगी रहती है । होमर, शेक्सपियर, कीट्स, टालस्टाय, रोम्यरोला, कालिदास, माघ दण्डी, आदि साहित्यकारों की रचनाओं पर आज तक कोई प्रश्न या शंका सामान्यत: प्राप्त नहीं होती। यह अन्याय के वल इसी महाकाव्य के प्रति है। इसका मूल कारण यही है कि आज मानस के आवश्यक शब्दों के जानकार मर्मज्ञ बहुत कम है। ज हैं वे केवल कपोलकल्पित, मनगढंदत दन्तकथाओं की सृष्टि कर लच्छेदार, आकर्षण, सम्मोहक, वाणी द्वारा अपनी गलाकथा के प्रबल समर्थक ततथाकथित कुछ ही लोग हैं जिन्होंने श्र ीराम चरित मानस को अकस्मात बिना श्रम किए स्वार्थ साधन का चमत्कारिक ग्रंथ सिद्द कर रखा है। जिससे विश्व साहित्य का यह सर्वोच्च पावन पूज्य महाकाव्य सम्प्रदाय वाद का शिकार होकर लाल कपड़ों में बांद कर ऊंची जगह रखने का ग्रंथ बन गया है। अत: इस प्रकार के पूर्वाग्रहों से इस महाकाव्य को मुक्त करना होगा। इसके मार्मिक आवश्यक शब्दों पर शोध करनी होगी । यह हमारा कर्तव्य भी है।
संकलनकर्ता- राजेन्द्र कुमार शर्मा, रामायण प्रचारक समिति, राजनांदगांव

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