जिस प्रकार इस धरती पर सभी नदियों मे ंगंगा नदी सबसे अधिक पूर्ण फल प्रदान करने वाली पवित्र नदी है, जिसकी तुलना अनय् नदी से की ही नहीं जा सकती इसी प्रकार हिन्दु धर्म में वर्णित सभी व्रतों में गुरूवार व्रत का महात्म पुण्य समस्त व्रतों से अधिक भौतिक एवं आध्यात्मक के क्षेत्र का फल प्रदान करने वाला है। गुरूवार व्रत की तुलना किसी अन्य व्रत से की ही नहीं जा सकती मानव जीवन के लिए यह पारसमणि के समान है ।
हिन्दू धर्म में जहाँ तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की मान्यता है तथा अलग- अलग समुदाय, सम्प्रदाय द्वारा जहाँ अलग अलग देवी देवताओं की पूजा, अर्चना, उपासना आदि काल से होती चली आई है वहीं समय समय पर अलग अलग व्रत, उपवासों का क्रम प्रचलन में रहा है । मगर हर काल, में जिन व्रत का महत्व ऋषियों, मुनियों ने सबसे अधिक बताया है वह है गुरूवार को । गुरूवार को बीरवार व ब्रहस्पतिवार के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है । read more »
होली फिर आई है, हर साल आती है । आम के पेड़ों में बौर लग गए हैं । मौसम रंग बदल रहा है । गुनगुनी धूप के साथ सर्द हवाओं की सरगोशी अपने शबाब पर है । धूल, अंधड़ के साथ एक अलमस्त बयार । चहुंओर मौज का आलम ।
होली है क्या ? सिर्फ एक त्यौहार ? नहीं, यह त्योहार भर नहीं, उस से कहीं ज्यादा ! इसमें जीवन के बहुतेरे रंग शामिल हैं । हंसी-खुशी, राग-विराग, अच्छाई-बुराई, रिश्ते-नाते, अपनापा, दूरियाँ-नजदीकियाँ। और बेलगाम मौज-मस्ती ।
कुछ-कुछ ब्राजीली कार्निवाल की तरह, सांबा के नाच की तरह । पर इसे ब्राजीलियों की तरह खुले दिल से क्यों नहीं लेते ? क्यों अच्छाइयों के साथ-साथ बुराइयां भी बटोरने लगते हैं ? इस पर चर्चा कहीं और पहले तो यही कि महोली में ऐसा क्यों होता है, दूसरे त्योहारों में ऐसा क्यों नहीं होता कि मौसम के साथ-साथ मन भी बौरा जाए ? read more »

उत्सवधर्मिता हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है । छत्तीसगढ़ की संस्कृति में मड़ई मेलों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है । यहां पर स्थानीय जनभावना के अनुरुप मेलों-मंड़ईयों का आयोजन होता है ।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति विविध रंगों से रंगी हुई हैं वह लोक जीवन की अनगढ़ शैली में कल-कल, छल-छल निनाद करती हुई बहती है । मड़ई शब्द सुनते ही एक ऐसा दृश्य आंखों के सामने आता है, जिसमें गायन वादन के साथ घुंघरुओं की आवाज, तेज पदचाप, विविध ग्राम देवताओं के प्रतीकात्मक झंडे, जो झालरों की तरह बांस के उपरी भाग में बंधे होते हैं, सब कुछ समाहित होता है ।
तरह-तरह की श्रृंगार की वस्तुएं जैसे चूड़ीपाट, फंदड़ा, रंगी-बिरंगी टिकुली, झाबा, कान, हाथ और पैर के आभूषण, चटख रंगो वाली साड़ियां, गमछे, रंगीन कुर्ते, बैलों का घांघरा, बर्तन-माड़ा, साग-भाजी, मिट्टी के बने खिलौने, बांस की टोकनियां और मस्ती में झूमते युवक-युवतियां वृध्द और चकित बालवृंद सब यहीं मिल जाते हैं । राउत नाचा से लेकर सारे ग्रामीण खेल जैसे गुल्ली डंडा, फुगड़ी, खो-खो और भौंरा-बांटी आदि सब आंखों के सामने तैरने लगते है । read more »

श्रीरामचन्द्र की विजय का पर्व विजयादशमी आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दसमी तिथि पर मनाया जाता है । इसे दशहरा भी कहा जाता है । इस पर्व को भगवती के विजया नाम पर विजयादशमी भी कहा जाता है । इस दिन भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की थी । इस स्वरूप में इस विजयादशमी कहते हैं ।
यह काल तारा उदय होने के कारण विजयकाल होता जिस समय सर्व सिध्दि दायक काल बनता है । इसलिए विजया दशमी भी कहा जाता है । भगवान राम ने शक्ति की उपासना की है और भगवान शंकर की भी, ये दोनों देव शक्ति की परिचायक है । हर शक्ति इनके आगे नि:स्तेज है । भगवान राम अवतार लेते हैं और शक्ति का नाम लेकर रावण का संहार करते हैं इसलिए इनके साथ माता का पर्व भी जुड़ा हुआ है ।
शारदीय नवरात्र में चैत्र की रामनवमी में भगवान राम शक्ति से जुड़े प्रतीत होते हैं देवी ने हर युग और काल में अपने को अजन्मा सिध्द किया है । सीता देवी का जन्म नहीं हुआ, उनका प्राकटय हुआ । श्रीकृष्ण की राधा बनकर रास मंडल में विराजित देवी भी अजन्मा स्वरूप है । देवताओं ने अपनी शक्ति से इनको सुसज्जित किया है । देवी ने असुरों का संहार करके उनके मनोरथ पूर्ण किये । देवी भगवती तो महानिशा महामाया है । read more »
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