दशहरा, विजय दशमी विजय का पर्व

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श्रीरामचन्द्र की विजय का पर्व विजयादशमी आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दसमी तिथि पर मनाया जाता है । इसे दशहरा भी कहा जाता है । इस पर्व को भगवती के विजया नाम पर विजयादशमी भी कहा जाता है । इस दिन भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की थी । इस स्वरूप में इस विजयादशमी कहते हैं ।

यह काल तारा उदय होने के कारण विजयकाल होता जिस समय सर्व सिध्दि दायक काल बनता है । इसलिए विजया दशमी भी कहा जाता है । भगवान राम ने शक्ति की उपासना की है और भगवान शंकर की भी, ये दोनों देव शक्ति की परिचायक है । हर शक्ति इनके आगे नि:स्तेज है । भगवान राम अवतार लेते हैं और शक्ति का नाम लेकर रावण का संहार करते हैं इसलिए इनके साथ माता का पर्व भी जुड़ा हुआ है ।

शारदीय नवरात्र में चैत्र की रामनवमी में भगवान राम शक्ति से जुड़े प्रतीत होते हैं देवी ने हर युग और काल में अपने को अजन्मा सिध्द किया है । सीता देवी का जन्म नहीं हुआ, उनका प्राकटय हुआ । श्रीकृष्ण की राधा बनकर रास मंडल में विराजित देवी भी अजन्मा स्वरूप है । देवताओं ने अपनी शक्ति से इनको सुसज्जित किया है । देवी ने असुरों का संहार करके उनके मनोरथ पूर्ण किये । देवी भगवती तो महानिशा महामाया है ।

वह ऐसे उपक्रम करती है कि भक्तों का कल्याण हो उनके सारे कारज सिध्द हो इसलिए राम के साथ सीता बनकर वन वन डोली । स्वर्ण मृग की लालसा में रावण ने सीता का हरण किया, और सीता के हरण से ही रावण के अत्याचारों से मुक्ति मिली । राम अपना कारज सिध्द कर पाये और मर्यादा पुरूषोत्तम राम बन पाये । देवी सीता के रूप में नारी के स्वाभाविक गुणों को सामने रखा गया है । नारी के गुणों में सौन्दर्य, लज्जा, विनय, संयम, तप, संतोष, धीरता, वीरता, गंभीरता, क्षमा, श्रमशीलता, गंभीरता सहिष्णुता, निर्भिमानी, सेवा सुश्रुता आदि गुण प्रमुख है ।

पति की सेवा में सीता जी ने समाज के समक्ष मूल्य रखे । भगवान शंकर के साथ सती जीवन में उन्होंने इन्हीं तत्वों का निरादर किया । शंकर जी ने मना किया लेकिन राम की परीक्षा लेने निकल पड़ी, पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया और बिन बुलाये पहुंच गयीं । वहां अपने पति का निरादर देखकर रहा नहीं गया तो युगाग्नि में भस्म में हो गई । पति ने त्यागा तो पिता के यहां भी प्रेम नहीं मिला । अंतत: तप करके उनको अर्पणा बनना पड़ा । पार्वती के रूप में उनको शंकर का साथ पाने को लंबा संघर्ष करना पड़ा ।

पार्वती बनी तो शंकर के साथ आराध्य हो गयी । उमा - महेश्वर की यह जोड़ी पूज्यनीय हो गयी । भगवान विष्णु के साथ इनका सदा सर्वदा वास रहता है । उनका संकल्प है कि जब -जब भगवान अवतार लेंगे वह उनके साथ रहेंगे । त्रेता में भगवान विष्णु के अंशावतार राम के साथ सीता, द्वापर में राधा बनकर श्री कृष्ण के साथ, दोनों ही रूपों में पार्वती जी उनकी आराध्य रही । सीता जी ने राम को पाने पार्वती की आराधना की । राधा ने श्रीकृष्ण के लिए व्रत किया । भगवान राम का जन्म भी असूरों का संहार के लिए ही हुआ ।

त्रेता में जन्में भगवान श्रीराम अमोध शक्ति हैं । राम नाम जीवन की तरंग है तो देवी उनका संचार । शक्ति के बिना शक्तिमान नहीं, और शक्तिमान के बिना शक्ति नहीं । जगदम्बा कहती हैं नर और नारी प्रकृति स्वरूपा हैं, प्रकृति उनके बिना चल नहीं सकती । इसलिए सृष्टि का भला अर्ध्द नागेश्वर बनकर भगवान करते हैं ।

भगवान राम का नाम मंत्रों का बीज मंत्र है । आज भी काशी में भगवान शंकर मरणासन्न प्राणियों को मृत्यु दिलाने के लिए राम नाम का उपदेश देते हैं । भला जिनके अराधक राम हो देवी उनसे दूर कैसे जा सकती है । यही भक्ति सजीव रूप में चैत्र नवरात्र से मिलती है और यही रामनवमी का हेतु भी है । इसलिए भगराम को सिध्दि का दायक और विजय दशमी को विजय का पर्व कहा जाता है ।

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