दहेज

आज दहेज प्राय: हर समाज में दानवीय रूप ले चुका है । जो समुचित अथवा कहें वट पक्ष के मनोनुकूल दहेज नहीं दे पाते उनसे तो वर पक्ष रूष्ट होता ही है उनकी बेटी जो विवाहोपरांत उनके घर की बहू बन जाती है और जिसे लक्ष्मी कहा जाता है उसे तरह तरह से प्रताडि़त किया जाता है । दहेज की बढ़ी मांग के चलते ही अनेक सुशील सुशिक्षित और सुंदर बेटियां भी या तो अविवाहित रह कर जीवन व्यतीत करने को बाध्य होती है या अन्तरजातीय विवाह करने को विवश होती है । शायद इसीलिए आजकल प्रेम विवाह बढ़ रहे हैं । वैसे ये प्रेम विवाह सफल हो यह जरूरी नहीं है सफल प्रेम विवाह का लडक़े लडक़ी के विचारों के सामंजस्य और एक दूसरे के अनुरूप स्वयं को ढाल कर पूर्ण समर्पण भाव से एक दूजे का हो जाने से ही निभते हैं । जहां केवल शारीरिक भूख के चलते त्वरित निर्णय पर किये गये विवाह अधिकाधिक सफल नहीं हो पाते । वैसे तो हर दम्पत्ति में झगड़े होते हैं पर ये मर्यादा में बंधे होने वाले संस्कारों के कारण विस्फोटक रूप नहीं ले पाते अपितु कुछ इस तरह होते हैं जैसे मिष्ठान्न के साथ नमकीन अथवा चटपटा व्यंजन ।
खैर समयानुसार परिस्थितियां बनती और बिगड़ती है और इनमें स्वयं ही सुधार कर अपने अनुकूल बना सकते हैं । सरकार भी इस ओर सक्रिय है दहेज विरोधी और नारी सुरक्षा हेतु कई कानून भी बनाये गये हैं पर क्या मात्र कानून बन जाने से समाज सुधरा हो जाता है ? समाज हम से है और हम ही समाज सुधार कर सकते हैं । जिसके लिए सकारात्मक सोच आवश्यक है । अन्यथा हर कानून से बचने के लिये रास्ते निकाल लेना आदमी की फितरत है । दहेज कानून का दुरूपयोग कुछ इस प्रकार होता है कि बहू की मनमानी में कोई व्यवधान आया और उसके पूरे ससुराल पक्ष पर आरोप लगा दिया कि ये सब मुझे दहेज के लिए प्रताडि़त करते हैं, अनेक ऐसे प्रकरण मिलेगें जहा गरीब घर की कन्या को आदर्शवादी पिता ने अपनी बहू बनाया बिना दहेज के और उसी वधू ने पति के साथ ही सास ससुर जेठ जिठानी , देवर, ननद सभी के विरूद्ध थाने में रिपोर्ट लिखाकर आरोपी बना दिया अपितु उनकी चल अचल संपत्ति पर भी अपना अधिकार जमाने में कसर नहीं की । लडक़ी के मायके वाले भी लडक़ी का साथ बढ़-चढ़ कर देते हैं । श्वसुर की स्वअर्जित और पैतृक संपत्ति को भी स्त्री धन कहकर हर दांव चला जाता है । यहां मेरा केवल इनता मानना है कि शादी के बाद यदि लडक़ी के मायेक वाले उसकी ससुराल के क्रियाकलापों में बिना किसी ठोस प्रमाण के हस्तक्षेप न करे तो लडक़ी का दाम्पत्य जीवन निभ सकता है ।
हम बात कर रहे थे दहेज की । दहेज एक पुरातन परम्परा है । राम और सीता के विवाह में राजा जनक ने न केवल भरपूर धन दौलत दी थी अपितु सेवकों दास दासियों को भी खुले हाथों पारितोषक दिये थे । इसी का उदाहरण अक्सर वर पक्ष वाले दहेज की मांग के औचित्य को प्रतिपादित करने के लिये दिया करते है । पर इस पर गहन मंथन करने से सत्य जो प्रकट होता है वह है कि सीता के अनुरूप राजा जनक की प्रतिज्ञा को अपने शौर्य से धनुष तोड़ कर राम का वर रूप में मिलना बहुत बड़ी बात थी । इसी हर्षातिरेक में राजा नजक ने अपनी सामथ्र्य के अनुसार दोनों हाथों से दान दहेज दिया । राम या दशरथ ने उनसे कोई मांग नहीं की थी । अत: दहेज लेना या देना बुरा नहीं परंतु दहेज की मांगना वह भी बिना सामने वाले की हैसियत देखे समझे बिना ठीक वैसा ही है जैसे कोई सम्यक गृह स्वामी से उसके सर्वस्व की मांग करे। दहेज तब और भी वीभत्स हो जाता है जब किसी लडक़े की शादी किसी कुलीन पविार में तय हो रही होती है । और तभी कोई धनाढ्य उस लडक़े लिये ज्यादा या दुगुना धन देने का लालच देकर अपने सांवली या काली लडक़ी का संबंध उसी लडक़े से येन केन प्रकारेण करा देता है। लडक़ा मर्यादा में बंधा होने से केवल अपनी किस्मत को रोता है या फिर विवाहेत्तर संबंध बनाकर अपना दाम्पत्य जीवन नष्ट कर लेता है ।
इन सभी बातों पर गहन मंथन कर यदि हम अपने समाज में इस बुराई को मिटाने का संकल्प ले ले तो हमारी संतान सुखी रहेगी और हमारा वंश भी सुंस्कारों से परिपूर्ण होकर आदर्श प्रस्तुत करने में सक्षम होगा । विप्र कुल को सनातन वर्ण व्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ इसके तपस्वी, त्यागी और सर्वहिताय सोच के कारण ही कहा गया है, आज हम समय के प्रवाह में बहकर अर्थ लोलुप होकर अपने संस्कार भूल रहे हैं। शायद इसीलिए दुर्दशा की ओर बढ़ रहे हैं ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे और हम कह सके कि हम ऋषियों की संतान है । मनोहर शर्मा, माया, जबलपुर

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