दहेज

दहेज

आज दहेज प्राय: हर समाज में दानवीय रूप ले चुका है । जो समुचित अथवा कहें वट पक्ष के मनोनुकूल दहेज नहीं दे पाते उनसे तो वर पक्ष रूष्ट होता ही है उनकी बेटी जो विवाहोपरांत उनके घर की बहू बन जाती है और जिसे लक्ष्मी कहा जाता है उसे तरह तरह से प्रताडि़त किया जाता है । दहेज की बढ़ी मांग के चलते ही अनेक सु

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आजादी की तर्ज पर सामाजिक लड़ाई का नेतृत्व करें

बड़ी कामयाबियां हमेशा स्वत:स्फूर्त आंदोलनों से चलकर निकलती है । देश की आजादी का आंदोलन भी किसी ने रूपरेखा बनाकर नहीं शुरू किया था । यह किसी एक मंगल पांडे का वैयक्तिक गुस्सा भी नहीं था । यह पूरे देशकी बगावत और गुस्सा था ।

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