दुर्लभ पुष्प - ब्रह्म कमल

 ब्रह्म कमल
 ब्रह्म कमल
 ब्रह्म कमल

सूर्यास्त के बाद खिलने वाले फूल ब्रह्म कमल ने एक बार फिर अपनी मुस्कान बिखेरनी शुरू कर दी है। कहा जाता है कि आम तौर पर फूल सूर्यास्त के बाद नहीं खिलते पर ब्रह्म कमल एक ऐसा फूल है, जिसे खिलने के लिए सूर्य के अस्त होने का इंतजार करना पड़ता है। हमारे मोहल्ले ऍम आर कालोनी में प्रो श्री ऍम एल शर्माजी के निवास पर आज शाम यह फुल खिला, तब से यह फूल यहां आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। सूर्य अस्त होने के बाद ही यह फूल खिलता है, इसलिए लोग इसे खिलते हुए देखने के लिए लालायित रहते हैं। खिले इस ब्रह्म कमल फूल को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी। लोगों ने यहां आकर ब्रह्म कमल फूल की पूजा-अर्चना भी की।परिवार के सदस्यों सहित आसपास के लोगों ने ब्रह्म कमल की पूजा-अर्चना की। इस फूल की विशेषता यह है कि जब यह खिलता है तो इसमें ब्रह्म देवत त्रिशूल की आकृति बन कर उभर आती है। गौर हो कि इस फूल का वानस्पतिक नाम एपीथायलम ओक्सीपेटालम है तथा इस फूल का प्रयोग जड़ी-बूटी के रूप में किया जाता है।इस फूल के बारे में कुछ लोगों का कहना था कि आम तौर पर फूलों को भगवान पर चढ़ाया जाता है लेकिन ब्रह्मकमल ही ऐसा फूल है जिसकी पूजा की जाती है।
ब्रह्म कमल ऊँचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है जो कि सिर्फ हिमालय, उत्तरी बर्मा और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है। धार्मिक और प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्म कमल को इसका नाम उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा के नाम पर मिला है। ब्रह्मकमल कमल की अन्य प्रजातियों के विपरीत पानी में नहीं वरन धरती पर खिलता है। सामान्य तौर पर ब्रह्मकमल हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है। इसकी सुंदरता तथा दैवीय गुणों से प्रभावित हो कर ब्रह्मकमल को उत्तराखंड का राज्य पुष्प भी घोषित किया गया है। वर्तमान में भारत में इसकी लगभग 60 प्रजातियों की पहचान की गई है जिनमें से 50 से अधिक प्रजातियाँ हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं। उत्तराखंड में यह विशेषतौर पर पिण्डारी से लेकर चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ तक पाया जाता है।माना जाता है कि ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। दुर्लभता के इस गुण के कारण से ब्रह्म कमल को शुभ माना जाता है। इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था।

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