भारतीय पंचाग पध्दति में प्रतिवर्ष सौर पौष मास को खरमास कहते हैं ।इसे मलमास भी कहा जाता है । इस महीने का आरंभ 14 दिसंबर से होता है और ठीक मकर संक्रान्ति को खरमास की समाप्ति होती है । खरमास के दौरान हिन्दु जगत में कोई भी धार्मिक और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं । इसके अलावा यह महीना अनेक प्रकार के घरेलू और पारंपरिक शुभ कार्यों की चर्चाओं के लिए भी वर्जित है ।
देशाचार के अनुसार नवविवाहिता कन्या भी खरमास के दौरान पति के साथ संसर्ग नहीं कर सकती और उसे इस पूरे महीने अपने मायके में आकर रहना पड़ता हौ । खरमास में सभी प्रकार के हवन, विवाह, चर्चा, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, यज्ञोपवीत , विवाह या अन्य हवन कर्मकांड निषेध है। सिर्फ भागवत कथा या रामायण कथा का सामूहिक वर्ण ही खरमास में किया जाता है । ब्रह्म पुराण के अनुसार खरमास में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति नर्क का भागी होता है । व्यक्ति अल्पायु हो या दीर्घायु अगर वह पौष के स्तर मास की अवधि में अपने प्राण त्याग रहा है तो उसका इहलोक और परलोग नरक के द्वार की तरफ खुलता है ।
इसबात की पुष्टि महाभारत में होती है, जब खरमास में अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युध्द में बाणों की शैय्या पर लिटा दिया था । सैकड़ों बाणों से विध्द हो जाने के बावजूद भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे । इसका मूलकारम यही था कि अगर वह खरमास में प्राण त्यागते तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाता । लिहाजा उन्होंने अर्जुन से एक ऐसा तीर चलाने के लिए कहा जो उनके सिर पर विध्द होकर तकिये का काम करे । इस तरह भीष्म पितामह पुरे खरमास में अर्ध्द मृत अवस्था में बाणों की शैय्या पर लेटे रहे और जब माघ मास की मकर संक्रान्ति आई उसके बाद शुक्ल पक्ष की एकादशी को उन्होंने अपने प्राण का त्याग किया ।
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