समाजों के कल्याथार्थ कार्य करें
राष्ट्र व राज्य का नेतृत्व करने युवाओं को आज आगे आने की आवश्यकता है । ऐसे युवा जो ईमानदारी पूर्वक राजनीति या देश को अपना पेशा बनाना चाहते हों और उनमें वास्तव में उर्जा व काबिलियत हो ऐसे ईमानदार पेशवर युवा नेतृत्व को यदि जनता चुनकर राजनीति में स्थापित करे तो एक प्रतिस्पर्धा का माहौल देश के भीतर निर्मित होगा । लेकिन वर्तमान समय में देश में नागरिक बोध पैदा करने की आवश्यकता है । जिसके तहत देश हमें देता है सब कुछ, हम भी कुछ देना सीखें । आखिर इस सत्तर साल के समाज में क्या बदल गया यह समझ से परे है। लाख उपलब्धियों के बावजूद वर्तमान में ढेर सारी विसंगतियां और आक्रोश नजर आता है । गणतंत्र में हमें अपने योगदान पर विचार करना होगा । केवल मोमबत्ती जलाने या आपसी चर्चाकरने मात्र से या सरकारों व राजनीति को कोसने मात्र से कोई समाधान उत्पन्न नहीं होने वाला । पुरे तंत्र में हमारी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए । खासकर गणतंत्र में जब राजनीति प्रधान हो और सभी चीजें राजनीति के इर्द गिर्द घूमती हो तो राजनीति में खास सक्रियता और देश के प्रति दायित्व बोध की एक ऐसी भावना हमें हमारी युवा पीढ़ी में जागृत करने की आवश्यकता है जिस पर देश गर्व कर सके ।
हमारा देश वैसे ही हिन्दू धर्म की देन, वर्ण व्यवस्था से जाति उपजातियों में बंटा हुआ है । देश की उन्नति, भाईचारा और विकास के दूसरे पायदानों तक पहुंचने के बावजूद हर दस घर में अपने को दूसरों से अलग समझने बाहर की जाति या सहगोत्र में शादी करने पर आज भी जाति पंचायतें बैठती और फैसलें लेती हैं । अब जरूरत है जोड़ों को सीमेन्ट से भरने की, जहां राजनीतिक बाज छैनियां लेकर घूम रहे हैं जहाँ भी दरार दिखे वहां मत चुको पत्थरों को तोड़ डालो ताकि उनका राजनीतिक फायदा हो और उन्हें पांच दस हजार की भीड़ जुटाना आसान हो सके । छोटे- छोटे टुकड़ों को जोड़कर अपना वोट बैंक बना सकें । छोटे- छोटे राज्य बनाकर वहाँ से बड़ी जमात से मुयमंत्री का पद पाकर अपनी बादशाहत कायम कर सकें । समाज को तोड़ने में उन्हें फायदा और आसानी नजर आती है । जैसे एक 50 फीट ऊंचा पेड़ भी 6 इंच कुल्हाड़ी के सामने बेबश और मजबूर नजर आता है और कटकर चूर चूर हो जाता है । ऐसी की राजनीति कुल्हाड़ी की भांति देश को राज्यों को बांटने में लगी है ।
लोकतंत्र अब षडयंत्र में बदल गया है । साजिश जनता के खिलाफ राज माफिया का और आंसू जनता के बनते जा रहे हैं । छत्तीसगढ़ में अभी-अभी विधानसभा के लोकसभा के फिर नगरों के अब गांवों के चुनाव सपन्न हुए हैं । इनके बीच छुटमुट तरीके से सहकारिता के चुनाव भी हो गये । लोकतंत्र पर पैसा और राजतंत्र और राजशाही का समन्वय यहां निरंतर देखने को मिल रहा है । पार्टियां एक दूसरे को दिखावा कोसते हुए पार्टी नेतृत्व बिके हुए महसूस होते हैं । ऐसे समय में समाज की अपनी महती जिमेदारी को युवाओं को महसूस करना होगा और देश के प्रति अपने नागरिक बोध को जागृत कर सर्व समाजों के कल्याथार्थ समग्र विकास की कल्पना को लेकर कार्य करने केलिए संकल्पित होकर आगे आने की आवश्यकता है ।
संगठन की दृष्टि से आने वाला समय परशुराम जयंती और छत्तीसगढ़ में परशुराम सद्भावना यात्रा का समय रहेगा मुझे विश्वास है कि आप सभी प्रबुध्द पाठक इन कार्यक्रमों की उपयोगिता जानकर चढ़बढ़कर हिस्सा लेकर संगठन को मजबूत बनायेंगे ।
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