पदोन्नति में आरक्षण समाज विरोधी

देश के दस राज्यों उत्तरप्रदेश , राजस्थान, बिहार, हरियाणा, उतराखंड, पंजाब में सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण के विरूद्ध आंदोलन की काली आंधी चल रही है । राज्यों की राजधानियों में समानता मंच ने रैलियों, धरनो का आयोजन शुरू किया है । आरक्षण समापति अभियान संयुक्त संस्था मंच, समानता मंच, नेशनल कम्पेन एंगेस्ट करेप्शन, समता मंच आदि ने चार विधानसभा चुनाव वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ , दिल्ली ने आरक्षण को पदोन्नति में देने के विरूद्ध जंगी मोर्चा खोला है। इन संगठनों ने रहस्योद्घाटन किया कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने लोकसभा विधानसभा में अनुसूचित जाति (एससी) एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) की आरक्षण के आधार पर सीट सुरक्षित रखने के सन 1999 के संविधान के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार कर निर्णय के लिए संविधान पीठ को सौंपी है । समानता मंच के पंडित मांगेराम शर्मा, समता मंच (दिल्ली) के नमित वर्मा ने यह भी रहस्योद्घाटन किया कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय पहले ही आरक्षण में आरक्षण असंवैधानिक मान चुका है। नेशनल कम्पेन एगेस्ट करेप्शन के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री एवं पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने लोकसभा में 6 सितम्बर 1990 को मंडल आयोग के आरक्षण का सीधा विरोध किया । पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने आरक्षण के मसले पर दो टूक शब्दों में कहा कि आरक्षण लाभ सबसे गरीब को और सभी धर्मों को मानने वालों को मिले । राजीव गांधी ने संविधान का उल्लेख करते ह ुए कहा कि हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य जाति विहिन समाज की संरचना का है । ऐसे में सरकार को समाज को जातियों में विभाजित करने वाले कदमों आरक्षण से बचना चाहिए । पूर्व केन्द्रीय मंत्री वसन्त साठे ने भी कहा कि राजीव गांधी आरक्षण के पक्ष में नहीं थे । प्रधानमंत्री रहे पामुलपर्ती वेंकटा नरसिम्हा राव ने आरक्षण में ऊपरी परत (क्रीम लेयर) हटाने की ऐतिहासिक पहल की। सरकार में प्रथम श्रेणी आला अफसर, द्वितीय श्रेणी आदि एससी एसटी आगे आरक्षण लाभ समापन का प्रस्ताव सामने आया ।
इस संयुक्त मुहमि से संबद्ध्र मांगेराम शर्मा, केसी कौशिक के अनुसार विधायिका की सुरक्षित सीट संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के विपरीत है। समानता मंच ने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश गुलामी के दौरान ब्रिटेन ने भारत में 81 वर्ष पहले सन 1932 में पृथक मतदाता की शुरूआत कर जातिवाद में देश के आंतरिक विभाजन की नींवरखी । सन 1931 में ब्रिटिश सरकार ने जातीय आधार पर जनगणना करवाई । सन 1938 में प्रख्यात चिन्तक आरएन चट्टोपाध्याय ने मार्डन रिव्यू में ब्रिटिश सरकार की योद्धाजातीयों के कथित सिद्धांत थ्योरी ऑफ सो काल्ड मार्शल रेसेज) के दरगामी खतरों से सावधान किया । ब्रिटिश राज मे अपरोक्ष आरक्षण वाली पृथकता नीति 1932 में 1952 अर्थात 20 वर्ष चली । संविधान सभा में भारी विरोध के बाद 10 वर्ष के लिए आरक्षण लागू हुआ । यह उलझी हुई पहेली है कि 60 वर्ष बाद भी आरक्षण क्यों है ? आरक्षण का लाभ वास्तव में एससी (दलित), एसटी (वनवासी) के कितनो ंको मिला ? समानता मंच के अनुसार वर्तमान आरक्षण व्यवस्था पुराने डांचे से भी खराब है । उधर आरक्षण समाप्ति अभियान संयुक्त संस्था मंच का कहना है कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने आरक्षण में क्रीमी लेयर ऊपरी परत को चिन्हित कर आरक्षण सुविधा से 20 वर्षों सन 1992-2012 में वंचित क्यों नहीं किया ? क्या यह सरकारी नियमों विधियोंका नग्न संवैधानिक उल्लंघन नहीं है ? उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 32 के अंतर्गत ही संविधान के 79 वें संशोधन को चुनौती दी गई . भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने सिंह गर्जना की कि यदि नागरिक को प्रतिनिधित्व चुनाव का अधिकार नहीं है तो लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता है । याचिका करने वालों की दलील थी कि तत्कालीन 79 दलित आरक्षित लोकसभा क्षेत्रों में 18 करोड़ गैर एससी को अपनी रूचि का प्रत्याशी निर्वाचित करने का अदिकार नहीं है । इन 79 संसदीय क्षेत्रों में 3 करोड़ दलित लाभान्वित है । इसके अलावा गैर आरक्षित संसदीय क्षेत्रों के दलितों (लगभग 10 करोड़) को यह विशेष अधिकार क्यों नहीं है ?
पी. भानु जी राव उप संपादक

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