परिवार के जुड़ाव में रामायण की प्रासंगिकता

भारतीय संस्कृति कृषि प्रधान संस्कृति है । इस संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है परिवार प्रेम । विश्व कवि श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर के शब्दों में रामायण घरेलू जीवन का महाकाव्य है । विश्व की किसी भी संस्कृति में परिवारिक आदर्शों पर आधारित रामायण जैसा महाकाव्य नहीं है ।
किसी ने बताया था कि अमेरिका के स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों में भारतीय बच्चे अमेरिकी बच्चों से अधिक अंक प्राप्त करते हैं, क्योंकि भारतीय बच्चे मधुर पारिवारिक प्रेम के मध्य पलते हैं । रामायणी कथा हमें सीख देती है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनापन दिया जाय और आवश्यकता पडऩे में उसके लिए तन मन धन का त्याग किया जाये । परिवार प्रेम से ही व्यक्ति समाज, राष्ट्र और विश्व के प्रति लगाव के संस्कार पाता है ।
दशरथ ने राम से कभी नहीं कहा था कि तुम वन को जाओ । यदि राम कैकेयी की बात न मानकर वन को न जाते तो कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था । किन्तु राम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए इतना बड़ा त्याग किया । पिता भी बेटे को इतना चाहते थे कि उन्होंने पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग दिये । राम अपनी तीनों माताओ ंका आदर करते थे । महलों में पत्नी सीता ने पतिव्रत का पालन करते हुए वन का कठोर जीवन स्वीकार किया । राम उन्हें प्राणों से भी अधिक चाहते थे । उनके बारे मे ंकहा गया है कि वे कभी परायी नारी की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते थे ।
राम ने भाई भरत के लिये राज्य त्यागा तो भरत ने भी बड़े भाई के प्रति आदर का भावरखकर सिंहासन पर राम की खड़ाऊं रखकर शासन किया । वे भी भाई की तरह तपस्वी बने रहे । लक्ष्मण भाभी सीता का इतना सम्मान करते थे कि उन्होंने सीता के चरणों को छोडक़र कभी आंखे उठाकर उन्हें नहीं देखा । उर्मिला ने अपनी बड़ी बहन सीता और जेठ राम की सेवा करने के लिए पति को उनके साथ जाने दिया । उसने महलों में रहकर भी 14 वर्षों का वनवास भोगा। बाप बेटा, मां- बेटा, भाई भाई, देवर भाभी, बहिन बिहिन आदि के प्रति त्यागमय प्रेम की प्रेरणा रामायण से मिलती है । जिन परिवारों पर रामायणी कथा का प्रभाव है उनमें आज भी एक दूसरे के प्रति लगाव है । राम कथा परिवार को जोड़ती है तोड़ती नहीं ।
नयी पीढ़ी के लोग अपना भविष्य बनाने के लिए नयी नयी तकनीके अपना रहे हैं । उन्हें जीविका के चक्कर में परिवार से दूर रहना पड़ रहा है । परिवार छोटे होकर पति पत्नी और छोटे बच्चों तक सीमित रह गये हैं । ऐसे सीमित परिवारों में संयुक्त परिवार के अच्छे संस्कारों का अभाव रहता है। इनका परिचय रामायणी संस्कृति से नही ंहो पाता। बड़े लोगों को चाहिए कि वे रामायण ग्रन्थ पढ़े और अपने बच्चों को घुट्टी में ही सरल भाषा में रामकथा का परिचय दे। बच्चों को रामकथा संबंधित फिल्में दिखाये तथा बाजार में उपलब्ध रामकथा संबंधी सरल सचित्र पुस्तकें पढऩे को कहे । विजयदशमी और रामनवमी पर्व परिवार में धूमधाम से मनाये जाने चाहिए । यदि नयी पीढी राम के चरित्र को भूल गयी तो वह परिवार को जोड़े रखने वाले, संस्कारों से वंचित रह जायेगी ।
डॉ. रमानाथ त्रिपाठी, दिल्ली

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