प्रबोधिनी एकादशी

प्रबोधय अर्थात जाग्रत हो जाओ। उठो, आंखे खोलो, जीवन को कर्मपथ पर ले चलो। गीता के अनुसार हमारा धर्म कर्म पर आधारित है। धर्म तो कर्म पथ का दीप स्तंभ है जो प्रेरणा, स्फूर्ति एवं ताकत देता है। कर्म हीन मनुष्य धर्म शाल नहीं हो सकता. भाव , ज्ञान और कर्म धर्म की अनिवार्य इंद्रियां है । यथा- भाव हीन धर्म रस हीन होता है। ज्ञानहीन धर्म अंधा होता है और कर्महीन धर्म लंगड़ा होता है। इसीलिए भगवान कृष्ण ने महाभारत युद्ध के पूर्व अर्जुन से कहा था
उतिष्ठ कौन्तेय, जाग्रत: भव: ।
सर्वाणि धर्माणि परित्य’य माम् एकम् शरणम् ब्रज।
कार्तिक शुक्ल एकादशी को हम चार माह से सोये भगवान को जगाते हैं । वास्तव में प्रभु कभी सोता नहीं है। बल्कि उसके माध्यम से हम स्वयं को जगाते हैं। यही तो हमारी संस्कृति की विशेषता है कि हमारा हर पर्व जागृति भाव और मानव धर्म कर्म से जुड़ा होता है। जैसे सोये हुए को जगाना, बैठे हुए को उठाना, उठे हुए को चलाना, चलते हुए को दौड़ाना, उदासीन को विचारवान बनाना, गिरे हुए को उठाना आदि।
महान विचारक सुकरात का मानना है कि मनुष्य का ज्ञान ही उसका सद्गुण है। मनुष्य की जागृत अवस्था ही उसके ज्ञान और सद्गुण की पोषक होती है। वेदों की वाणी का आशय है कि उत्तिष्ठित जागृत प्राप्यवरान् निबोधत। अर्थात हमें अपने मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए जागृत रहना चाहिए। मगर दुख इस बात का है कि आज हम धर्म, नीति, संस्कृति, संस्कार, परंपरा, पर्व, त्यौहार जैसी महत्व की बाते पीछे छोड़ चुके हैं। फलत: अधर्म और असत्य ही खुलकर नाच रहे हैं। यही विकृति आज हमारी संस्कृति बन चुकी है। यही कारण है कि आज हमारे सभी त्यौहार व्रत आदि दिखावा होकर रह गये हैं।
प्रबोधिनी एकादशी के पर्व पर भगवान विष्णु और तुलसी का विवाह कराने की परंपरा है। पुराणों में ऐसी कथा है कि जालंधर नाम का राजा अपनी पत्नी वृंदा के पतिव्रत्य के बल पर समाज में अत्याचार फैलाये हुए था। उसे वरदान था कि जब तक वृंदा का पातिव्रत्य भंग नहीं होगा तब तक उसे कोई मार नहीं सकता। चिंतित होकर भगवान विष्णु ने समाज को इस उत्पीडऩ से मुक्त कराने के लिए जालंधर का रूप धारण कर वृंदा का पातिव्रत्य भंग किया। सच का पता चलने पर क्रोधित वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने श्राप दिया। फलत: भगवान विष्णु पत्थर रूप होकर शालिग्राम कहलाये। इस पर भगवान ने भी वृंदा को श्राप दिया कि वह वनस्पति रूपा हो जाये। वही वृंदा वनस्पति रूप में तुलसी कहलाई। यही कारण है हर प्रबोधिनी एकादशी पर हम शालिग्राम और तुलसी का विवाह करवाते हैं। व समाज में संदेश देते हैं कि वह जागृत रहे, सचेत रहे, अत्याचारों का विरोध करे. साथी ही तुलसी के माध्यम से यह भी संदेश देते है कि नारी सदा से महान व पूजनीय रही है अत: उसे किसी के छलावे में नहीं आना चाहिए। इस प्रकार भगवान विष्णु ने जड़ता को वनस्पति के साथ जोडक़र जीवन के विकासक्रम को समझाया है। बताया है कि तुलसी विष्णु प्रिया है। कल्याण स्वरूपा है। जिस घर के आंगन में तुलसी होती है वहां का वातावरण पवित्र बनता है। पापी विचार नष्ट होते हैं। वह आरोग्य और धन संपदा देती है। विष्णु और तुलसी का विवाह मण्डप रस भरे गन्नों से सजाया जाता है। ताकि हर जीवन गन्ने की तरह मीठे रस से भरा रहे। इस दिन भी दिवाली की तरह पूरे घर को अनंत दीपकों और रंगोली से सजाया जाता है। इसलिए इसे देव दिवाली भी कहते हैं।
प्रबोधिनी एकादशी इसी सिद्धांत पर चलने का व्रत उत्सव है। यह जीवन को घोर निन्द्रा से जगाने का दिवस है। आलस्य और प्रमाद को त्यागने का दिवस है। प्रभु काज को करने के लिए दृढ़ संकल्पित होन ेका दिवस है। जीवन को प्रभु के साथ जोडऩे का दिवस है। इस प्रकार यह जड़ चेतन संपूर्ण पृथ्वी पर जागरण का त्यौहार होता है। तात्पर्य यह है कि मानव जीवन में व्याप्त अंधकार न तो सूर्योदय से दूर हो सकता है और न ही मुर्गा के बांग देने से अपितु मनुष्य के स्वयं को जगाने से ही दूर हो सकता है। इस पुण्य पर्व पर मुझे ये पंक्तियां याद आती हैं।
उठ जाग मुसाफिर भोर भई।
अब रैन कहां जो सोवत है
जो सोबत है सो खोवत है
जो जागत है सो पावत है।

डॉ. स्नेहलता पाठक
शंकर नगर, रायपुर

Tags: