भगवान शिव की आराधना

भारत वर्ष एक विशाल देश है। इसमें विभिन्न धर्मों, जाति, भाषा व प्रदेश के लोग रहते हैं। सभी अपने अपने अनुसार पूजा, व्रत, उपवास व अनुष्ठान करते हैं । यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं, जिसमे ंशिव आराधना का महाशिवरात्रि पर्व एक विशेष त्यौहार है । ईसान संहिता में शिवरात्रि पर्व के संबंध में बताया गया है कि- माग कृष्ण चतुर्दश्यामातिदेवी महानिशि, शिवलिंग, तयोद्वूत: कोटि सूर्यसमप्रभ:। तत्कालवपिनी ग्राहमा शिवरात्रि व्रत: तिथि:माघ मासकी कृष्ण चतुदर्शी की महानिशा में आदि देव महादेव कोटि सूर्य के समान दीप्ति सम्पन्न हो शिव लिंग के रूप में आविर्भूत हुए थे. अतएव शिवरात्रि व्रत में उसी महानिशा व्यापिनी चतुर्दशी का ग्रहण करना चाहिए । माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी बहुधा फाल्गुन मास मे ंही पड़ती है । ईसान संहिता के आधार पर शिव की प्रथम लिंग मूर्ति का उक्त तिथि को आविर्भूत हुई। भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताया कि फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आश्रय मानकर जिस अंधकारमयी रजनी का उदय होता है उसी को शिवरात्रि कहते हैं । इसी दिन शिव की दूध, दही, घृत, विल्व पत्र, मधु, आक धतूरा वअपनी सामथ्र्य के अनुसार पूजन करना चाहिए ।
वेदों में भगवान शंकर का विशेष वर्णन है। यजुर्वेद के प्रधान देव भगवान रूद्र हैं सोहलवां अध्याय रुद्र की महिमा से परिपूर्ण है इसलिये यह रूद्राध्याय के नाम से प्रसिद्ध है । वेदों के अलावा अनेक स्मृतियों तथा इतिहास पुराणों में भगवान शंकर का स्पष्ट वर्णन है। स्कन्ध पुराण , लिंग पुराण व शिव पुराण आदि में विस्तृत वर्णन है।
नागेन्दाय त्रिलोचनाय भस्मागंशगाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय ,तस्मै न काराय नम: शिवाय।।
जिनके कण्ठों में सांपो ंका हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिसका अनुलेपन है दिशाएं जिनका वस्त्र है, उन शुद्ध अविनाशी महेश्वर न कार स्वरूप शिव को नमस्कार है।
रूद्राक्ष की उत्पत्ति- रूद्रस्य अक्षि रूद्राक्ष: अक्षियुपलक्षतिम अश्रु लज्जन्य : वृक्ष: अर्थात शंकर जदी के अश्रुओं से उत्पन्न हुआ वृक्ष रूद्राक्ष वृक्ष हुआ। देवी भागवत मे ंकथा है कि एक बार भगवान शंकर ने देवताओं और मनुष्य के हितों के लिये त्रिपुरासुर का वध करना चाहा और एक सहस्त्र तक तपस्या की तथा अधोस्त्र का चिन्तन किया । भगवान की आंखों से अश्रुओं के गिरने से रूद्राक्ष वृक्ष की उत्पत्ति हुई। रूद्राक्ष एक मुख से 14 मुख तक होते हैं । इसको शुभ मुहूर्त में सभी वर्ण के लोग धारण कर सकते हैं। भगवान शंकर को अद्र्ध नारिश्वर व नटराज भी कहते हैं।
श्री शिव और श्री राम नाम - एक दिन पार्वती ने महादेव जी से पूछा हर दम क्या भजते रहते हो ? उत्तर में महादेव जी ने कहा विष्णु सहस्त्रनाम । अन्त में पार्वती ने कहा यह तो एक हजार नाम आपने कहे । इतना जपना सामान्य मनुष्य के लिये असम्भव है। कोई एक नाम बतावें जो इन सबके बराबर हो। तब भगवान शंकर ने कहा -राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्त्रनाम ततुल्यम रामनाम वरानने । भगवान शंकर व पार्वती के विदेशों में भी मंदिर है। इनके द्वादश नाम इस प्रकार है सौराष्ट्र सोमनात व श्री शैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्या महाकालमोंकारे परमेश्वरम् । केदार हिमवत्प्रष्ठे डाकिन्यां भीमशकेरम्, वाराणस्यां च विश्वेशं, त्रयम्बकं गौमती तटे. वैधनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने, सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मशं च शिवालय। द्वा दशैतानि नामानि प्रातरूत्याय य: पठेत सर्व पापैविनिर्मुक्त: सर्वसिद्धिफलं लभते्
भगवान शंकर की आराधना व भक्ति सभी लोगों ने की है। जिन्होंने भी की है उन्होंने अपनी इच्छा के अनुसार वर प्राप्त किया है ।
देवदत शर्मा दाधीच छोटीखाटू वाले

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