मकर संक्रांति : उत्तरायण का पर्व

हमारा देश धर्म और प्रकृति प्रदान है। अत: यहां के हर पर्व प्रकृति से जुड़े होते है। प्रकृति हमारे जीवन में ही नहीं हमारी परंपराओं में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यही कारण है कि हमारे हर त्यौहार ऋतुओं के अनुसार ही आते है। इसी क्रम में मकर संक्रांति का पर्व भी मूलत: प्रकृति से जुड़ा पर्व है । संक्रांति अर्थात परिवर्तन पौष के महीने में कर्मयोगी सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है और पृथ्वी की परिक्रमा करने की अपनी दिशा बदलते हुए उत्तरायण की ओर ढलता है । सूर्य के इसी परिवर्तन यात्रा दिवस को मकर संक्रांति का पर्व कहते हैं। सूर्य की यह परिवर्तन यात्रा अंधकार से प्रकाश का संदेश देती है इसी दिन से क्रमश: राते छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। मनुष्य का जीवन राग रंग से भरने लगता है। प्रकृति भी पुलकित होकर वसंतोत्सव मनाती है। अत: सूर्य का उत्तरायण में जाना शुभ माना जाता है।
मकर संक्राति के पौराणिक महत्व के अनुसार इस दिन भुवन भास्कर अपने पुत्र शनि महाराज से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं चूंकि शनि महाराज मकर राशि के स्वामी है । अत: इस पिता पुत्र मिलन दिवस का नाम मकर सखांरित पड़ा और इसीलिए एक दूसरे घर जाकर तिल गुड़ देकर आपसी संबंधों को स्नेहिल बनान ेकी परंपरा भी है। महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह के भी अपनी मृत्यु को उत्तरायण काल तक रोककर मृत्यु के देवता यमराज पर विजय पाई थी। अपनी इसी प्रतिज्ञा के कारण वे भीष्म कहलाये। मकर संक्रांति का पवित्र पर्व केवल उत्तर भारत में ही नहीं अपितु पूरे देश में हर्ष और उल्लास से मनाया जाता है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने की शुभ बेला में पूरा देश अपने अपने तरीकों से भिन्न भिन्न नामों से इस पर्व में खुशी मनाता है। दक्षिण भारतीय इसे पोंगल के नाम से मनाते हैं। दक्षिण की भाषा में पोंगल अर्थात उफान या सूर्य देव का प्रसाद पंजाब में लोहड़ी के ना मसे आग जलाकर उसकी परिक्रमा अथवा पारंपरिक नृत्य कर मनाया जाता है। कहीं पर इसे भोगाली बिहू के रूप में भी मनाते है। त्यौहार का आरंभ सुबह उठकर तिल के उबटन से नहा धोकर पूजा पाठ , दान धर्म आदि से होता है । खिचड़ी तिल के लड्डू, धन, वस्त्र आदि का दान मंदिरों में ब्राह्मणों घर के बड़े बुजोर्गं, गरीबों और सुहागिन महिलाओं को हल्दी कुुं कुं आदि लगाकर दिया जाता है। महाराष्ट्र में विशेष रूप से इसे देते समय कहते हैं कि तिल गुड़ खाओ मीठा मीठा बोलो।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस ऋतु में यह पर्व पड़ता है उसी के अनुसार तिल गुड़ का महत्व बतलाया गया है । मकर संक्रांति शीत ऋतु का पर्व है। शीत के कारण हमारा शरीर और त्वचा सिकुड़ से जाते हैं अत: उसमें ताजगी और स्निग्धता लाने के लिये चिकनाई की जरूरत होती है। शीत से बचने के लिये उर्जा की भी जरूरत होती है । अत: तिल और गुड़ क्रमश: चिकनाई और उर्जा हमारे शरीर को उर्जा प्रदान करते है और तमाम तरह के रोगों से भी रक्षा करते हैं। तिल और गुड़ से पाचन शक्ति अच्छी रहती है। इससे हमारे चेहरे और शरीर की त्वचा में ताजगी और चमक (ग्ने) आती है। गुजरात में मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की प्रथा भी शरीर को ताजगी और स्फूर्ति देती है। शीत ऋतु में छत पर पतंग उड़ाने से हल्की धूप शरीर को विटामिन डी प्रदा नकरती है। इस तरह से मकर संक्रांति से जुड़े प्रकृति के हर रूप हमारे स्वास्थ्य का संवर्धन करती है। इस अवसर पर गंगा स्नान तब और मन दोनों को पवित्र और आनंदित करता है। वैचारिक दृष्टि से मकर संक्रांति अर्थात तमसो मा ज्योर्तिगमय: तात्पर्य यह है कि मानव जीवन में व्याप्त अज्ञानता, अधंश्रद्धा अविवेक, जड़ता, कुसंस्कार और आपसी वैमनस्य को हटाकर जीवन में परिवर्तन लाना ही मकर संक्रांति का हेतु है। यह परिवर्तन वैचारिक दृष्टि से मुख्यत: चार भागो में बांटा जा सकता है। संग संक्रांति, संघ संक्राति, सम्यक संक्रांति और समतामूलक संक्रांति याने यह दिन संकल्पों का दिन है । मनुष्य शुभ संकल्प तभी कर सकता है जब उसमें वैचारिक स्तर पर परिवर्तन होगा।
पहली संक्रांति है संग संक्रांति । अर्थात काम क्रोध, मोह, मद, मत्सर, ईष्र्या, द्वेष आदि से दूर हटकर समाज कल्याण की भावना का संग करना । संघ संक्रांति अर्थात व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ आपस में मिल जुलकर संगठन शक्ति की ओर बढऩा । यही संगठन संक्रांति न केवल परिवार और समाज को मजबूत बनाती है पितु समूचे राष्ट्र को शक्ति मिलती है तीसरी है सम्यक संक्रांति । इस तरह की संक्रांति भावना आदमी को विपरीत परिस्थितियों से अनुकूल परिस्थितियों की ओर गमन करना सिखाती है । समता मूलक संक्रांति व्यक्ति से राष्ट्र तक फैली होती है । इस तरह की संक्रांति, आदमी को सत्य प्रेम, करूणा, सद्भाव, सहयोग से जोडक़र आपसी जाति गत भेदभाव से छूट करती है। महाराष्ट्र में शायद इसी आशय को ध्यान में रखकर एक दूसरे को तिल गुड़ देकर कहते हैं कि तिल गुड़ ध्या क्षाणि गोड़ गोड़ बोला. तिल गुड़ के माध्यम से हम एक दूसरे को अपने मन की मिठास और स्निग्ध व्यवहार देकर पुरानी खटास और टूटे संबधों को जोडऩ ेका पवित्र काम करते हैं जैसे तिल से गुड़ मिल जाता है तो मजबूत लड्डू बन जाता है। कुल मिलाकर मकर संक्रांति पर्व सर्व धर्म की भावना लिये प्रेम सौहाद्र्र आपसी मेल मिलाप, सामाजिक उत्कर्ष और मंगल कामना का पर्व है । आइये हम भी मिलजुल कर मकर संक्रांति पर ऐसा ही संकल्प ले ताकि तिल और गुड़ से बने मीठे लड्डू की तरह समूचे मानव समाज में प्रेम की गंगा प्रवाहित हो जाये। जिस तरह गंगा गुण अवगुण का भेद किये बिना सबका स्वागत करती है उसी तरह सारे भेद भाव मिटाकर हम भी कामना करे।
आओ मिलकर करें कामना, फूलों सी हो सरस भावना
कोयल सा मीठा बोलो, भंवरों सा मधुरस घोलो।
तिल गुड़ सा हो मिलन हमारा, कभी न छूटे साथ हमारा ।
यही हमारा नारा हो, यही हमारा नाता हो।।

डॉ. (श्रीमती) स्नेहलता पाठक
मेसेनट-44, शंकर नगर, रायपुर

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