महर्षि विश्वामित्र भगवान राम के गुरू

महर्षि विश्वामित्र जी को भगवान श्री राम का दूसरा गुरू होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । वे दण्डकारण्य में यज्ञ कर रहे थे जहां रावण के द्वारा भेजे गये ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों ने बार बार यज्ञ में व्यवधान उत्पन्न किया तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से यह ज्ञात कर लिया की तीनों लोको को भय त्राण से मुक्त कराने परमब्रह्म श्रीराम अवतार अयोध्या में हो चुके हैं । फिर वे यज्ञ रक्षा के लिए महराज दशरथ से मांगकर विश्वामित्र ने भगवान राम को यज्ञ स्थल पर ले गये ।

यज्ञ रक्षा के उपरान्त भगवान राम को विश्वामित्र ने अपनी विद्याएं प्रदान की और उनका मिथला में सीता जी से विवाह संपन्न करवाया ।

वे महाराज गाधि के पुत्र थे । कुशवंश में पैदा होने के कारण उन्हें कौशिक भी कहा जाता है ।

महर्षि विश्वामित्र बड़े ही प्रज्ञापालक और धर्मात्मा राजा थे । एक बार वे जंगल में शिकार के लिए गये थे जहां वे महर्षि वशिष्ठ के आश्रम दिखाई दिया वशिष्ठ ने उन्हें राज्य की कुशम क्षेम पूछी और सेना सहित उनका आदर सत्कार किया । यहां पर इनके आदर सत्कार में महर्षि वशिष्ठ ने अपने योग बल और कामधेनु की सहायता से पूरी सेना के सत्कार से विश्वामित्र चकित रह गये और जहां कामधेनु को प्राप्त करने के लिए युध्द हुआ ।

महर्षि विश्वामित्र युध्द में हारने के बाद वे तपस्या कर ब्रह्म ऋषि बने । तपस्या के दौरान मेनका नामक अप्सरा ने भी विघ्न डालने का प्रयास किया एक समय वे सब कुछ छोड़ कर वे मेनका के प्रेम में डूब गये जब उसे होश आया तो उन्हें उसका अत्यधिक पश्चाताप हुआ और वे पुन: कठोर तपस्या में लगकर अपने सिध्दी को प्राप्त किया ।

महर्षि विश्वामित्र ने अपने काम व क्रोध पर विजय प्राप्त की । ऐसा कहा जाता है कि राजा त्रिशंकु सदैव शरीर सहित स्वर्ग जाना चाहते थे यह प्रकृति के नियम विरूध्द होने के कारण वशिष्ठ जी ने उनका कामना पूर्ति के यज्ञ को करने से स्वीकार नहीं किया । जिससे वशिष्ठ से अपने पुराने बैर को स्मरण करके विश्वामित्र ने उनका यज्ञ करना स्वीकार कर लिया ।

सभी ऋषि गण इस यज्ञ में पधारे किन्तु वशिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आए । इस पर विश्वामित्र क्रोध से आग बबूला होकर उनके सौ पुत्रों को मार डाला । इस भयंकर भूल का अहसास होने पर महर्षि विश्वामित्र ने पुन: क्रोध पर विजय प्राप्त करते सच्चे लगन से तप किया और ब्रह्म ऋषि बने ।

आज भी सप्त ऋषि मंडल में वे विराजमान है । महर्षि विश्वामित्र आजीवन पुरूषार्थ और तपस्या के मूर्ति रहे ।

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