महासंगठन क्यों नहीं ?

सभी संगठनों को मिला महासंगठन क्यों नहीं ? मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य का चहुंमुखी विकास समाज के अन्दर ही संभव है. समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सुसंकृत होना अति आवश्यक है और इसके लिए हमे सब मिलकर कार्य करने की आवश्यकता है. समाज सुखी एवं उन्नतशील बने, ऐसी सामाजिक भावना और संस्कारों से हमें ओत-प्रोत होना चाहिए. हिंदु संस्कृति में ऐसे संस्कार और शिक्षा की ही प्रधानता रही है. आक्रान्ताओं के हमलों और विदेशी परतंत्रता के चलते विभिन्न कारणों से हमारी जाति-व्यवस्था में अवश्य ही कुछ कुरीतियाँ पैदा हुई हैं जिसके फलस्वरूप हिंदु समाज में जाति-वैमनस्यता फैली. इसमें कोई दो राय नहीं कि इस वैमनस्यता में ब्राह्मणों का भी हाथ रहा है. परन्तु अब समय बदल गया है।
समाज के बदलते स्वरूप में आज यूँ कहने को तो सभी कहते हैं कि जाति-व्यवस्था कुछ नहीं रखा है यह कुरीतियाँ बंद होनी चाहिए. परन्तु मिलनेवाली सरकारी सुविधाओं और लाभ-हानि की गणना करते हुए इस जाति व्यवस्था को कोई भी समाप्त नहीं करना चाहता. जिसने भी इमानदारी से इस व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयत्न किया वह स्वयं हाशिये पर धकेल दिया गया । शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि जाति व्यवस्था की कुरीतियों को झेलनेवाले बिहार रा'य के मुख्यमंत्री रहे पंडित जगन्नाथ मिश्र ने इसको समाप्त करने के लिए अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में यह आदेश पारित किये थे कि अपने नाम के आगे कोई भी अपनी जाति या जातिबोधक शब्द नहीं लगाएगा और उन्होंने इस आदेश को मूर्तरूप देने के लिए अपने नाम के आगे मिश्र शब्द हटा लिया था. उनके इस आदेश का सभी वर्गों ने न केवल विरोद्ध किया था बल्कि जाति शब्द हटाने की अपेक्षा उनको ही सत्ता से ही हटा दिया. शायद उनके बाद ही वहाँ कांग्रेस की सरकार ही नहीं बन पाई है. जाति हमारे देश और समाज की यह एक स'चाई है जिसे स्वीकारना ही होगा । जाति में अपना लाभ देखने की होड़ में सभी जातियों के अपने-अपने संगठन हैं तो प्रश्न उठता है कि ब्राह्मणों के क्यूँ नहीं होने चाहिए ? परन्तु ब्राह्मण संगठनों की विडम्बना यह है कि जिस गति से संगठनों में सदस्यों की संख्या बढनी चाहिए वह तो दिखाई नहीं देता, हाँ संगठनों की संख्या अवश्य ही बड़ रही है. स्थानीय स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगठन बन रहे हैं. दु:ख तो तब होता है जब ब्राह्मण जाति के नाम पर बने इन संगठनों का उद्देश्य ब्राह्मण जाति के लोगों को संगठित कर उनका सर्वांगीण उत्थान करने की अपेक्षा मात्र धार्मिक कृतों और पर्वों का आयोजन करना ही रह गया है. जबकि यह काम हिंदु धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाली सभी संस्थाएं व अनुसरण करनेवालीं जातियां पूर्व से ही करती आ रही हैं. आज आवश्यकता इस बात की है कि जाति के नाम पर बने इन संगठनों को ब्राह्मण जाति से सम्बन्ध रखने वाले आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, वृद्धों, कन्याओं और नवयुवकों की हर प्रकार से सहायता करनी चाहिए. केवल ब्राहमण होने के नाते जो सामाजिक अत्याचार या शोषण उन्हें झेलने पड़ रहे हैं, संगठित हो उस त्रासदी से उनका बचाव करना चाहिए. परन्तु विडंबना यह है कि ब्राह्मण जाति के नाम पर बन रहे बड़े-बड़े संगठनों के पीछे मंशा कुछ और ही दिखाई देती है. संगठनों का निर्माण तो अदृश्य राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जा रहा है.
समाज में संगठन की महती आवश्यकता मानव इतिहास में अनन्त काल से चली आ रही है, संगठन छोटा हो या बडा, संगठन सशक्त होना चाहिए. संगठन में ही अपार शक्ति होती है, संगठित हुए बिना समाज के विकास की कल्पना करना व्यर्थ है. जो समाज संगठित है वही अनवरत विकास के मार्ग पर द्रुत गति से अग्रसर होगा. परन्तु जातियों के नाम पर संगठन बना अपने स्वार्थ व निज हित साधने वालों की भी कमी नहीं है. आज हमें समाज में कार्य कर रहे ऐसे ब्राह्मण संगठनों के प्रति जागरूक एवं सजग रहने की आवश्यकता है. अब समय आ गया है कि ब्राह्मण संगठनों को यह चिंतन करना होगा कि क्या एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्थान-स्थान पर ब्राह्मणों के नाम के इतने संगठनों की आवश्यकता है ? क्या इनका विलय नहीं होना चाहिए ? क्या कारण है कि इतने अधिक संगठन बन गए है ? क्या यह तथाकथित संगठन ब्राह्मण समाज का विधटन तो नहीं कर रहे हैं ? संगठनों का विलय असंभव तो नहीं, हाँ कठिन कार्य अवश्य ही है. राक्षशों से मानव और देवों की रक्षा करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले ऋषि दाधीच की संतान हम ब्राह्मण, क्या अपने समाज के हित के लिए अपने अहम् का त्याग कर संगठनों का विलय करने को तैयार नहीं हो सकते ? चलिए प्रादेशिक स्तर तक तो अभी ना सही, परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर सभी ब्राह्मण संगठनों का विलय कर केवल एक ही संगठन बनाने का प्रयास तो किया जा सकता है. चलिए यह भी यदि अभी कठिन लगता है तो क्या राष्ट्रीय स्तर के सभी संगठनों को मिला कर एक महा ब्राह्मण राष्ट्रीय गठबंधन या संगठन नहीं बनाया जा सकता है. राष्ट्रीय स्तर के एक ही संगठन के बैनर तले यदि हम आकाश चीरती गर्जना करेंगे तभी सफलता संभव है, अन्यथा यहाँ ग्राहक कम और दूकानदार अधिक वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है व्यक्तियों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए नित नए संगठनों का निर्माण लक्ष्य की प्राप्ति तो नहीं, हाँ ब्राह्मणों को उपहास का विषय अवश्य ही बना रहे हैं. दिल्ली के रामलीला मैदान में गत मास 27 से 29 अप्रैल को आयोजित बहुभाषी ब्राह्मण महा सभा के महाकुम्भ नामक आयोजन को देख जिस पीड़ा का मुझे अनुभव हुआ वह शब्दों में लिखने लायक नहीं है. देश की राजधानी दिल्ली के विशाल एतिहासिक मैदान में इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन में ब्राह्मणों की सूक्ष्म उपस्थिति जनता में उपहास और हमारे लिए शर्म का कारण कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
विनायक शर्मा
राष्ट्रीय संपादक,हिमाचल प्रदेश

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