युवाओं के लिए संस्कारवान होना आवश्यक

आज की पीढ़ी में संयम तथा संवेदना का अभाव है। जिसका मुख्य कारण तामसी खानपान, आचार तथा व्यवहार है। चैनलों पर दिखाये जाने वाले अश्लील और उत्तेजनात्मक सीरियल भी इन बातों को बढ़ावा देते हैं। इसका इलाज यही है कि बचपन में ही बच्चों को आत्मसंयम का पाठ पढ़ाया जाये। उनको अच्छे संस्कारों की शिक्षा दी जाये। उन्हें ऐसी कहानियों तथा धार्मिक सीरियलों से अवगत कराया जाये जो दया, करुणा, क्षमा, संयम, नैतिकता का पाठ पढ़ायें। इसके अलावा पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा आवश्यक कर देनी चाहिए।
आज का युवा बिना रोक टोक आजादी की जि़दगी चाहता है। समय परिवर्तन के साथ-साथ सहनशीलता और संयम में कमी आयी है। आधुनिक सोच ने पुराने संस्कारों को भुला-सा दिया है। समय परिवर्तन के साथ युवा पीढ़ी ने संयम, सहनशीलता, क्षमा जैसे शब्दों को भुला-सा दिया है। आधुनिक शैली और पश्चिमी सभ्यता ने रफ्तार को अपनी मंजि़ल बना लिया है। उसका प्रभाव सामने आ रहा है। वहीं आधुनिक खानपान, सुविधाओं से परिपूर्ण व्यक्ति केवल रफ्तार की जि़ंदगी जी रहा है। शांति का अभाव होता जा रहा है। इसका एकमात्र इलाज है समाज के बुद्धिजीवियों को आगे आयें। स्कूलों में नैतिक शिक्षा को जरूरी बनाना होगा। नयी पीढ़ी को बताना होगा रफ्तार में जि़ंदगी नहीं बल्कि शांति और संयम में ही खुशहाल जि़ंदगी का राज छुपा है।
समाज विशेषकर युवा वर्ग में लगातार कम हो रही सहनशीलता व संवेदनशीलता एक गहन चिंता का विषय है। छोटे-छोटे विवादों में आपा खोना, एक-दूसरे को देखकर ईष्र्या का भाव जाग्रत होना युवाओं की विकृत प्रवृत्ति है। भौतिकवादी युग में लगातार क्षीण हो रहे मानवीय मूल्य इसके लिए जिम्मेदार हैं। साथ ही जल्दबाजी में सब कुछ हासिल करने की युवा पीढ़ी की प्रवृत्ति भी इसके मूल में है। चैनलों में क्राइम से जुड़े धारावाहिकों के माध्यम से युवा पीढ़ी को वास्तविक एवं अविश्वसनीय कुकृत्य प्रस्तुत कर अपराध के प्रति आगाह कर रहे हैं किंतु फिर भी युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट है। उचित नैतिक शिक्षा एवं उपयुक्त परामर्श ही संयम खोती पीढ़ी को पतन से बचा सकती है क्योंकि शिक्षा ही एक ऐसा हथियार है जो असंभव को संभव और नामुमकिन को मुमकिन कर सकती है। युवा पीढ़ी आगे आये और शिक्षा प्राप्त करे शिक्षा के औजार से जीवन को सफल बनाए ।
अरविन्द ओझा, प्रधान संपादक

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