राम

ब्राह्मण जाति नहीं उच्च संस्कृति है

ब्राह्मण को लोग जाति के नाम से जानते हैं और बहुत संकीर्णता की दृष्टि से देखते तथा जातिवादी समझते हैं । परंतु यह मिथ्या है, असत्य है । ब्राह्मण तो अति उदार, दयालु परोपकारी है। स्वत: भूखा रहकर अतिथि व भूखे का पेट भरता है। शरणागति को स्वत: का प्राण देकर उसकी रक्षा करता है। स्वत: कुटिया में रहकर राज

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राम लक्ष्मण का ब्रह्म भोज

छत्तीसगढ़ में हमारी किविदन्तियों एवं लोक कथाओं के अक्षय भण्डार में ऐसे ऐसे विलक्षण प्रसंग भरे पड़े हैं कि लगता है इनका विधिवत सृजन एक समानान्तर रामचरित मानस को जन्म दे सकता है ,कुछ कथाएं बहु प्रचलित है और कुछ अल्पपरिचित ऐसी ही एक छोटी सी किन्तु महत्वपूर्ण कथा सौभाग्य से एक स्वामी जी से प्राप्त हु

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रामभद्र महायज्ञ आयोजित

अखिल सद्भावना निजात्म प्रेम धाम आश्रम मंजेश्वर केरल के संयोजक उमा कृष्ण नारायण पाण्डेय ने कहा कि थोड़ा समया ऐसा निकालों प्रेम करलों राम से। ध्यान रहे यह दुर्लभ सुअवसर हाथ से जाने न पाये। जोमन्त्र लेखन अभियान को सफल बनाने में श्रद्धा पूर्वक मन्त्र लेखन कर रहे हैं उन्हें तो आना ही है। साथ ही आदर

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भजन श्री राम महिमा

राम के गुण गा निरंतर, राम गुण चित लाइये ।
राम का महिमा से मंडित रूप नित मन ध्याइये ।
नित राम के गुण गाइये-नित राम के गुण गाइये ...
कर्त्तव्य पथ का यह रसायन, इक अनूपम नाम है।
सुख दुख में समता धर जिया, वह राम ही इक नाम है ।
राम ही इक नाम है...

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श्री शत्रुध्न

श्रीशत्रुघ्न जी का चरित्र अत्यन्त विलक्षण है । ये मौन सेवाव्रती हैं । बचपन से भरतजी का अनुगमन तथा सेवा ही इनका मुख्य व्रत था । जिस तरह लक्ष्मण जी हाथ में धनुष लेकर श्रीराम की रक्षा करते हुए उनके पीछे पीछे चलते थे, उसी प्रकार शत्रुध्न जी भी श्री भरत के साथ रहते थे ।

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श्री लक्ष्मण

श्री लक्ष्मणजी शेषावतार थे । भगवान श्रीराम का वियोग इन्हें सह्य नहीं था । वे छाया की भांति श्रीराम का ही अनुगमन करते थे । श्रीराम के चरणों की सेवा ही इनके जीवन का मुख्य व्रत था । श्रीराम की तुलना में सभी संबंध इनके लिए गौण थे । श्री लक्ष्मण के लिए श्रीराम ही माता- पिता, गुरू, भाई सब कुछ थे ।

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श्री भरत

श्री भरत की का चरित्र समुद्र की भांति अगाध, बुध्दि की सीमा से परे, लोक आदर्श का अद्भुत सम्मिश्रण तथा भ्रातृ प्रेम की सजीव मूर्ति थे । ननिहाल से अयोध्या लौटने पर माता द्वारा पिता के स्वर्गवास का दुखद समाचार मिलता है । वे इसके लिए अपने को बड़ा अभाता समझता है कि मुझे बड़े भैया श्रीराम को सौंपे बिना

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भगवान् श्रीराम

भगवान श्रीराम भारतीयों के लिए परम अराध्य, धर्मपरायण है । श्रीराम ही धर्म रे रक्षक, चराचर विश्व की रचना करने वाले, पालनहार तथा संहार करने वाले परब्रह्म के पूर्णावतार है । भगवान श्री राम धर्म के क्षीण हो जाने पर साधुओं की रक्षा, दुष्टों का विनाश तथा पृथ्वी पर शान्ति एवं धर्म की स्थापना करने के लिए

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महर्षि विश्वामित्र भगवान राम के गुरू

महर्षि विश्वामित्र जी को भगवान श्री राम का दूसरा गुरू होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । वे दण्डकारण्य में यज्ञ कर रहे थे जहां रावण के द्वारा भेजे गये ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों ने बार बार यज्ञ में व्यवधान उत्पन्न किया तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से यह ज्ञात कर लिया की तीनों लोको को भय त

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राम एक रामायण अनेक

राम कथा के प्रणेता के रूप में वाल्मीकि रामायण का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है । वाल्मीकि रामयाण को स्मृत ग्रंथ माना गया है इस ग्रंथ की रचना माता सरस्वती की कृपा से हुई थी । इस ग्रंथ को ॠतम्भरा प्रज्ञा की देन बताया जाता है । रामायण की रचना संस्कृत भाषा में हुई है ।

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