रामचरित मानस

रामचरित मानस और मकर संक्राति

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने मानस में मकर संक्रांति पर होने वाले इस सन्त समागम का इस प्रकार वर्णन किया है । माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मञ्जहि सकल त्रिवेनी।।
पूजहि माधव पद जल जाता, चरिस अरवय बटु हर सहिं गाता।

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राम लक्ष्मण का ब्रह्म भोज

छत्तीसगढ़ में हमारी किविदन्तियों एवं लोक कथाओं के अक्षय भण्डार में ऐसे ऐसे विलक्षण प्रसंग भरे पड़े हैं कि लगता है इनका विधिवत सृजन एक समानान्तर रामचरित मानस को जन्म दे सकता है ,कुछ कथाएं बहु प्रचलित है और कुछ अल्पपरिचित ऐसी ही एक छोटी सी किन्तु महत्वपूर्ण कथा सौभाग्य से एक स्वामी जी से प्राप्त हु

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