रामचरित मानस और मकर संक्राति

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने मानस में मकर संक्रांति पर होने वाले इस सन्त समागम का इस प्रकार वर्णन किया है । माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मञ्जहि सकल त्रिवेनी।।
पूजहि माधव पद जल जाता, चरिस अरवय बटु हर सहिं गाता।
भरद्वाज आश्रम अति पावन, परम रम्य मुनिवर मन भावन।।
तहां होय मुनि रिषय समाजा, जाहि जे मञ्जन तीरथराजा।
मज्जहि प्रात समेत उछाहा, कहहिं परस्पर हरिगुन गाहा ।।
भावार्थ -माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं तब सब तीरथराज प्रयाग को आते हैं. देवता दैत्य किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदर पूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं । श्री वेणी माधव जी के चरण कमलों को पूजते हैं। और अक्षयवट का स्पर्श कर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाज जी का आश्रम बहुत ही पवित्र पर रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों को मन को भाने वाला है। तीर्थराज प्रयाग में जो स्नान करते हैं उन ऋषि मुनियोंं का समाज वहां भरद्वाज के आश्रम में जुटता है। प्रात:काल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान के गुणों की कथाएं कहते हैं । यह जानने की बात है कि सन्त समाज में याज्ञवल्य के द्वारा रामकथा, का सर्वप्रतम उपदेश भी इसी अवसर पर हुआ था। महातपस्वी और परसज्ञानी याज्ञवल्य मुनि माघ मास में गंगा स्नान करने आए हुए थे। यहीं पर भरद्वाज मुनि ने श्रीराम के तात्विक रूप के विषय में उनसे जिज्ञासा की थी। महर्षि याज्ञवल्य ने उन्हें रामकथा का उपदेश दिया था। इस प्रकार अनादिकाल से मास में घटने वाली यह मकर संक्रान्ति एक ज्ञानपर्व रहा है जिसमें स्थूलता से आबद्ध साधारण मनुष्य की चेतना में भी आध्यात्कि क्रान्ति घटती रहती है।
मकर संक्रान्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका रूप जनोत्सव का है। समाज के प्रत्येक वर्ग का सदस्य चाहे वह शिक्षित हो या अशिक्षित सम्पन्न हो या विपन्न इसे सरलता से मना सकता है। इस पर्व का कोई विशेष कर्मकाण्ड भी नहीं है, बस गंगा स्नान और दान की ही प्रमुखता है । जिन वस्तुओं का दान किया जाता है वे नगरों एवं गावों में सहजता से उपलब्ध होती है जैसे तिल नया चावल, उड़द, गुड़ और मटर की फलियां। जिनसे खेत इस समय भरे होते हैं । तिल के दान का विशेष महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह हविष्यान्न है, वरन इसलिए भी है क्योंकि उसकी प्रकृति गरम होती है और ठण्ड में यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। नया चांवल नया गुड़ ऋतु की नई चीजें होती है। हमारे यहां यह मान्यता रही है कि ऋतु का कोई भी वस्तु पहले दूसरों को देकर ही ग्रहण करनी चाहिए । इसलिए गुड़ एवं चांवल के दान का विधान है । अन्न दान सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि प्राणी मात्र को भोजन प्रिय होता है। प्रिय वस्तु का दान ही कोई अर्थ भी रखता है । अप्रिय या अनपेक्षित वस्तु को देने में कोई उदारता नहीं होती । इसके अतिरिक्त दान, अनुदारता संग्रह और परिग्रह की प्रवृत्ति को भी रोकता है। इसी कारण प्रत्येक पूजन या पर्व त्यौहार के अनिवार्य अंग के रूप में दान का विधान अवश्य होता है।
मकर संक्रांन्ति के दिन तिल और चांवल उड़द की खिचड़ी का भोजन किया जाता है। ये सारे खाद्य पदार्थ जनसाधारण को आसानी से सुलभ होते हैं. यह पर्व किसी प्रकार का आर्थिक एवं सामाजिक दबाव नहीं पैदा करता । वास्तव में संक्रान्ति का स्वरूप इस कृषि प्रदान देश की फसलों सदा नीरा नदियों और ग्रामीण संस्कृति से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। यह पर्व जहां एक ओर लोगो ंके हृदय में आस्था उल्लस और सद्भावना की सृष्टि करता है वहीं दूसरी ओर जीवन की समस्याओं और तनावों से ध्यान हटाकर जनमानस को एक ऊंची भाव भूमि पर भी प्रतिष्ठित करता है। तृष्णा की नदी में डूबता उतराता मन वर्ष में एक बार ही सही ज्ञान गंगा का संस्पर्श भी प्रदान क र लेता है।
मकर संक्रान्ति का पर्व हिन्दुओं के प्रमुख पर्वों में से एक है। यह पर्व उस दिन होता है जिस दिन सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करता है, वह दिन संक्रान्ति दिवस होता है। इस पर्व में दान पुण्य, यज्ञ हवन तथा गंगा स्नान आदि का बड़ा महत्व बताया गया है। माघ के महीने में सूर्य धनु से मकर राशि में संक्रमण करता है। इसी को उत्तरायण गति कहते हैं । यह गति अत्यन्त शुभ होती है। इसीलिए शरशैय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी।
तिल के बने लडुड्ओं के साथ नये चांवल और उड़द की खिचड़ी का भी दान किया जाता है। इसीलिए इसे खिचड़ी का त्यौहार भी कहते हैं । एक अन्य शास्त्र के अनुसार इन पर्व पर भगवान शंकर के पूजन का भी विधान है । ऐसी मान्यता है कि यदि शिव लिंग पर घृत का लेपन कर तिल पुष्पों और बिल्व पत्र से उनकी अर्चना की जाय तो व्यक्ति के सभी दुख और दरिद्रता मिट जाते हैं।
संकलनकर्ता-राजेन्द्र कुमार शर्मा
रामायण प्रचारक समिति, राजनांदगांव

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