गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामचरित मानस जिसका पाठ सम्पूर्ण भारत वर्ष में होता है , जिसका विवाद स्वामी रामभद्राचार्य जी ने खड़ा कर दिया है। स्वामी जी ने इस ग्रंथ में तीन हजार गलतियां पकड़ने का दावा किया है । वास्तव में जिस रामचरित मानस में गलती पकड़ने का दावा कया है, वह वास्तव में पूज्य तुलसीदास द्वारारचित है ही नहीं । दूसरी बात यह है कि तुलसी दास जी ने भगवान शंकर की प्रेरणा से रामचरित मानस की रचना उस समय की थी, जब मुगलों का राज था और सरेआम हिन्दुओं का कत्लेआम होता था ,उन्हें जबरन हिन्दू से मुसलमान बना दिया जाता था । हिन्दुओंके धर्मका नाश हो रहा था, हिन्दु धर्म लोप हो रहा था ।
तब उन्होंने अपने सामर्थ्य से रामचरित मानस को इतना सरल सुंदर व रोचक बनाया, रोजमर्रा की बोलचाल व ग्रामीण भाषा में लिखा ताकि सबसे कम पढा लिखा गांव का आदमी भी आनंदपूर्वक पढ़ सके और इसका आनंद ले सके। इसलिए आज सम्पूर्ण भारत वर्ष में सर्वाधिक तुलसीकृत रामचरित मानसका ही पाठ होता है और इसी को लोग रूचि पूर्वक पढ़ते हैं । यह सबके मन भा गयी है । यदि किसी ने अपनी बुध्दि इसे सुधारने मे ंलगाई या इसमें कमियां निकालने में लगाई तो भारत के तमाम हिन्दू धर्मावलंबियों की भावनाओं पर यह कुठाराघात होगा, और यह कृत्य क्षमा करने योग्य नहीं होगा । तुलसीदास, सूरदसा, कबीरदास, रहीम दास हो चाहे रैदास, पलटू दास आदि सब की एक जैसी भाषा है । सबको इनके पद, भजन, दोहे आज सबको प्रिय लगते हैं मन को भाते हैं । read more »
श्री भरत की का चरित्र समुद्र की भांति अगाध, बुध्दि की सीमा से परे, लोक आदर्श का अद्भुत सम्मिश्रण तथा भ्रातृ प्रेम की सजीव मूर्ति थे । ननिहाल से अयोध्या लौटने पर माता द्वारा पिता के स्वर्गवास का दुखद समाचार मिलता है । वे इसके लिए अपने को बड़ा अभाता समझता है कि मुझे बड़े भैया श्रीराम को सौंपे बिना स्वर्ग सिधार गये ।
जब माता कैकयी के द्वारा श्रीम राम वनवास की बात बतायी जाती है तो श्री भरत काफी दुख से संतप्त होकर मां कैकेयी को क्रोध में लोभी, कलंकनी आदि भला बुरा कह डालता है । उन्होंने गुरू वसिष्ठ की आज्ञा से पिता जी की अन्त्येष्टि क्रिया संपन्न की । श्री भरत द्वारा सभी के बार बार कहने के उपरान्त भी उन्होने राज्य लेना अस्वीकार कर दिया तथा दल बल के साथ श्रीम राम को मनाने चित्रकूट चले गये । श्रृंगवेरपुर में पहुंचकर निषादराज को देखकर रथ का परित्याग कर दिया । read more »

भगवान श्रीराम भारतीयों के लिए परम अराध्य, धर्मपरायण है । श्रीराम ही धर्म रक्षक, चराचर विश्व की रचना करने वाले, पालनहार तथा संहार करने वाले परब्रह्म के पूर्णावतार है । भगवान श्री राम धर्म के क्षीण हो जाने पर साधुओं की रक्षा, दुष्टों का विनाश तथा पृथ्वी पर शान्ति एवं धर्म की स्थापना करने के लिए अवतरित हुए ।
भगवान् श्रीराम ने त्रेतायुग में देवताओं की प्रार्थना सुनकर पृथ्वी का भार हरण करने के लिए अयोध्यापति महाराज दशरथ के यहां चैत्र शुक्ल नवमी के दिन जन्म लिया और राक्षसों का वध कर त्रिलोक में अपनी कीर्ति स्थापित किया । भगवान श्रीराम जीव मात्र के कल्याण के लिए अवतरित हुए थे , विविध रामायणों, अठारह महापुराणों, रघुवंशादि महाकाव्यों, हनुमदादि नाटकों तथा महाभारत आदि में इनके चरित्र का वर्णन मिलता है । read more »

आतंकरूपी रावण के लिए आज राम की आवश्यकता
रावण शब्द से ही एक आतंकवादी, आततायी सताने वाले आदमी का चेहरा सामने आ जाता है । रावण पंडित था साथ मे ंपरम प्रतापी, दुस्साहसी, वैज्ञानिक , औषधियों का ज्ञाता, वेदों का जानकार, महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ था पर अत्याचार के कई रूप उसमें समाहित थे । वह तकनीकी ज्ञान का विशेषज्ञ था । सर्वगुण संपन्न होने पर भी वह अपनी लिप्सा के आधीन था । वह नहीं चाहता था कि विश्व में ब्रम्हाण्ड में कोई उसकी बराबरी कर सके, उससे टक्कर ले सके । अपने बलबूते से कई सिध्दियां, तपस्या से कई वरदान प्राप्त कर अजेय बन चुका था । जब उसे आभास होता था कि कोई उससे शक्ति में और विज्ञान में आगे जाने वाला है तभी वह उसके विनाश का उपक्रम कर नष्ट कर देता था । नवग्रह, कई देवी देवता, उसेक यहां बंदी बनकर रहे थे । इसी तरह आज के आतंकी, आकाओं की महत्वाकांक्षाएं भी है ।
रावण भारत खंड से बहुत ही आतंकित रहता था । यहां तपस्वी , वीर वैज्ञानिक, वैद्य सभी तरह की शक्तियों के ज्ञाता रहते थे पर ये योध्दथा लड़ाका नहीं थे । कई ऋषियों के पास अस्त्र- शस्त्रों की शक्तियां थी उनके प्रयोग मानव हित के लिए होते थे । मुनियों ने शब्द शक्ति को प्राणवान, उर्जावान, बनाया । मंत्र बल की सिध्दियों से सक्षम बने परंतु अकेला एक रावण अपने पास इतनी सिध्दियां, शस्त्र शक्ति समेटे हुए था कि वे सब उसके सामने तुच्छ थे । read more »

रामायण के महर्षि विश्वामित्र जी को भगवान श्री राम का दूसरा गुरू होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । वे दण्डकारण्य में यज्ञ कर रहे थे जहां रावण के द्वारा भेजे गये ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों ने बार बार यज्ञ में व्यवधान उत्पन्न किया तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से यह ज्ञात कर लिया की तीनों लोको को भय त्राण से मुक्त कराने रामायण के परमब्रह्म श्रीराम अवतार अयोध्या में हो चुके हैं ।
फिर यज्ञ रक्षा के लिए रामायण के महाराज दशरथ से मांगकर विश्वामित्र ने भगवान राम को यज्ञ स्थल पर ले गये । यज्ञ रक्षा के उपरान्त भगवान राम को विश्वामित्र ने अपनी विद्याएं प्रदान की और उनका मिथला में सीता जी से विवाह संपन्न करवाया । रामायण के महर्षि विश्वामित्र महाराज गाधि के पुत्र थे । कुशवंश में पैदा होने के कारण उन्हें कौशिक भी कहा जाता है । read more »

रामायण के पात्र महर्षि वशिष्ठ के भागीरथ प्रयत्न से गंगा धरती पर
महर्षि वशिष्ठ का वर्णन पुरानों में कई रुपों में बताया गया है । ब्रह्मा के मानस पुत्र , मित्रावरूण के पुत्र, अग्नि के पुत्र कहे जाते हैं । इनकी पत्नि का नाम अरूंधती देवी था । रामायण के महर्षि वशिष्ठ ने सूर्य वंश का पुरोहिती कार्य करते हुए अनेक जनकल्याणकारी धार्मिक कार्यों को संपन्न करवाया । उनके उपदेश पर भागीरथ प्रयत्न से गंगा जैसी पवित्र नदी हमारे लिए उत्पन्न हुई ।
भगवान व महर्षि वशिष्ठ के पिता ब्रह्मा जी ने मृत्यु लोक पर जाकर श्रृष्टि का विस्तार करने तथा सूर्यवंश की पुरोहिती करने का आदेश इन्हें दिया । ऐसा कहा जाता है कि उस ब्रह्माजी को रामायण के महर्षि वशिष्ठ ने सूर्यवंश के पुरोहिती कार्य करने को अत्यंत निंदा कार्य बताकर करने से इंकार कर दिया गया था लेकिन भगवान ब्रह्मा द्वारा उन्हें बताया गया कि आगे चलकर इसी वंश में रामायण के भगवान श्रीराम अवतार लेंगे और इसी मार्ग से उनके माध्यम से तुम्हें मुक्ति मिलेगी । जिस पर रामायण के महर्षि वशिष्ठ मृत्यु लोक पर आना और मानव शरीर धारण करना स्वीकार किया ।
महर्षि वशिष्ठ क्षमाशील थे । एक बार श्री विश्वामित्र उनके अतिथि के रूप में पधारे तो उन्होंने कामधेनु से अतिथि सत्कार किया । कामधेनु की अलौकिक क्षमता को देखकर विश्वामित्र ने उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की । लेकिन महर्षि वशिष्ठ के लिए कामधेनु अपार आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली साधन थी तो उन्होंने देने से मना कर दिया । जिस पर विश्वमित्र ने बलपूर्वक कामधेनु ले जाना चाहा, महर्षि वशिष्ठ के इच्छा पर कामधेनु ने अपार सेना खड़ी कर दी । जिससे विश्वामित्र को भागना पड़ा । read more »
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