वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था -जन्म मूलक या कर्म मूलक-- ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरूषसूक्त में शुद्र शब्द आया है इससे इस बात की पुष्टि होती है कि आज से लगभग 1500-1000 ईसा पूर्व अर्थात ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ था। यह माना जाता है कि इस काल में समाज समतावादी था अर्थात समाज में छूआछूत का प्रचलन नहीं था तथा समाज व्यवसाय के आधार पर पुरोहित, योद्धा एवं सामान्य जन में बंटा हुआ था।
इसके पश्चात उत्तर वैदिक काल (1000-500 ई पू.) में जिसमें अन्य तीन वेदों की रचना हुई समाज स्पष्ट रूप से चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद््र में विभाजित हो चुका था। इस काल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म न होकर जाति हो चुका था तथा पुरोहिती पर ब्राह्मणों का एकाधिकार एवं राजा का पद भी इसी काल में वंशानुगत हुआ, ऐसा इतिहासकारों का मानना है । इस काल में भी अस्पृश्यता या छुआछूत का प्रचलन नहीं था।
ये सब तो हुई इतिहासकारों की अपनी बाते इतिहासकार केवल थोड़े बहुत प्रमाण से ही अनुमान लगाकार अपनी बातों को सत्य प्रचारित करते हैं। उनके अनुसार वेदों को मनुष्यों ने रचा है जबकि हम हिन्दुओं के अनुसार ये अपारूषेय अर्थात ईश्वर द्वारा रचित है।
अक्सर अब्राह्मणों एवं कमजोर तार्किक क्षमता वाले ब्राह्मण द्वारा यह कहा जाता है कि वर्ण व्यवस्था जन्म मूलक न होकर कर्म मूलक है इसके प्रमाण स्वरूप वे गीता के निम्न श्लोकों को प्रस्तु करते हैं।
1. ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रतिभाक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।।
अर्थ- भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे परन्तप अर्थात शत्रुओं को जीतने वाले ब्राह्मओं, क्षत्रियों वैश्यों तथा शूद्रों में विभाजन उनके स्वभाव से उत्पन्न गुण एवं क्रियाओं द्वारा किया गया है।
2. शमो दसमस्तप: शौचं आन्तिरार्जवमेव च
ज्ञानं विज्ञान मास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।
अर्थ- शोतिफरियता, आत्मसंयम, तपस्या पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा ज्ञान विज्ञान एवं धार्मिकता ये सभी ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म है या ब्राह्मणों के स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
उपरोक्त दोनों श्लोकों को पढऩे से यही प्रतीव होता है कि वर्ण व्यवस्था कर्ममूलक है न कि जन्म मूलक परन्तु यदि हम इन श्लोकों के शब्दों पर ठीक से ध्यान दे तो इनमें एक कामन शब्द स्वभाव है।
स्वभाव किसे कहते हैं? वे भाव जो हमें स्वत: प्राप्त है अर्थात वे भाव जो प्राकृतिक रूप से अर्थात जन्म से ही विद्यमान है वही हमारा स्वभाव है। जैसे बंदरों का स्वभाव है उछल कुद करना, सांप का स्वभाव कुंडली मारना, शेर का स्वभाव शिकार करना. सभी जीवों को प्रकृति ने अलग अलग स्वभाव प्रदान किये हैं जिससेे प्रेरत हो वे अपने अपने जीवन का निर्वाह करते हैं अर्थात अपने जीवन को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं। कोई भी जीव दूसरे जीवका स्वभाव ग्रहण नहीं कर सकता।
जैसे शेर का बच्चा कभी गाय के बच्चे की तरह नहीं हो सकता और न ही गाय का बच्चा शेर के बच्चे की तरह हो सकता है क्योंकि दोनों प्राणियों की स्वभाविक प्रवृत्तियां अलग अलग है। स्वभाव प्राणियों को जन्म से प्राप्त होती है। कोई अब्राह्मण यदि ब्राह्मणवांचित कर्म करता है तो वह ब्राह्मण नहीं कहला सकता भले ही उसके प्रशंसनीय अवश्य है।
ठीक उसी तरह यदि कोई ब्राह्मण शराबी हो जाये तो उसे अब्राह्मण नहीं कहा जा सकात जैसे शेर यदि घास खाना शुरू भी कर दे तो उसे घोड़ा नहीं कहा जा सकता। जैसे शेर का स्वभाव घास खाना नहीं है उसी तरह ब्राह्मण का स्वभाव शराब पीना नहीं है बल्कि इसे उसने कुसंगित में सीखा है। शराब पीना या मांसाहारी होना मानवीय प्रवृत्ति नहीं अपितु आसुरी स्वभाव है इसलिये यदि कोई मानव ऐसा करता है तो वह आस्वभाविक है अर्थात कृत्रिम या सीखे हुए अवगुण है। सभी मानव स्वभाव से शाकाहारी है ।
जैव विवधता प्रकृति की विशेषता है । सभी प्राणियों में जैव विवधता पायी जाती है। एक छोटे से घास के मैदान से लेकर समुद्र तक सबमें जैव विवधता के दर्शन होते हैं. इसी कड़ी में मानवों में भी जैव विविधता पायी जाती है मानवों में भी विभिन्न प्रजातियां होती है और सभी प्रजातियों की अपनी अपनी स्वभाविक विशेषता होती है। विज्ञान अनुवांशिकता एवं डी.एन.ए. दोनों को मानता है अर्थात माता पिता के गुण दोषों की संतान में पुनरावृत्ति को विज्ञान स्वीकार करता है । इस प्रकार प्रत्येक वर्ण या समाज के लोगों का अपना अलग अलग स्वभाव है अपनी अलग अलग प्राकृतिक विशेषता है अपनी अलग अलग संस्कृति है और इन्हीं सब के कारण सबके व्यवहार, विचार व कर्म अलग अलग होते हैं। फिर वर्ण व्यवस्था को हम कर्म मूलक कैसे कह सकते हैं जबकि कर्म तो स्वभाव से प्रेरित होते और स्वभाव जन्म से प्राप्त होता है।
हमारे ब्राह्मण समाज के कुछ विद्वान महापुरूषों ने दलितों के पुर्नरूद्धार के लिए जो प्रयास किये वे निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। अस्पृश्यता का अंत करना छूआछूत की भावना को मिटाना भी मंगलकारी है, देशहित में मानव समाज के हित में है। इन महापुरूषों में कुछ इनसे भी महान निकले जो सस्ती लोकप्रियता पाने का प्रयास करने लगे और उन्होंने अपने समाज की वृत्ति उसके जीविका का साधन भी उन्हें देकर ब्राह्मण को लाचार करने का प्रयास किया । उन्होंने दूसरे समाज को सुदृढ़ बनाने के लिए अपने ही समाज को कमजोर बनाया । आज भी कई ब्राह्मण परिवार ऐसे है जिनके घर का चूल्हा पुरोहिती से जलता है उन्होंने इन परिवारों के बारे में जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। लोकप्रियता पाने के लिए उनके उन्माद का परिणाम उनकी अदूरदर्शिता का परिणाम आज एक गरीब ब्राह्मण भुगत रहा है।
आपने दलितों को समाज में अच्छा स्थान दिलवाया, सम्मान दिलवाया, आपने कोई गलत नहीं किया सभी मानव है और सबको ससम्मान जीने का अधिकार सरकार के पहले ईश्वर ने दिया है। यही कारम है कि भगवान राम ने शबरी के बेर खाये। परन्तु क्या आवश्यकता थी आपको अन्य समाज के लोगों को कर्मकाण्ड में दीक्षित करने का? क्या आवश्यकता थी आपको उन्हें गायत्री मंत्र प्रदान करने का ? गायत्री मंत्र का अधिकार तो केवल यज्ञोपवित धारित ब्राहमण को है। किसी ब्राह्मण महिला को भी नहीं फिर आपने किस अधिकार से ऐसा किया। शासन ने सभी समाज के हितों के लिए कुछ न कुछ किया ही है। ब्राह्मण एक तो आरक्षण की मार के कारण उपेक्षित है दूसरी ओर उनकी स्वाभाविक वृत्ति पर भी अब दूसरे समाज के लोगों ने अपना कब्जा करना शुरू कर दिया है ऐसी स्थिति में ब्राह्मणों का जीवन यापन मुश्किल हो चुका है। हमारे भूतकालिक विद्वानों की अदूरदर्शिता का ही परिणाम वर्तमान में ब्राह्मणों को अपनी अस्तित्व के खतरे के रूप में भुगतना पड़ रहा है । यही कारण है कि अब हमारे ब्राह्मण समाज के युवा कुप्रवृत्तियों की ओर बढऩे लगे हैं। साथ ही आज कल ब्राह्मण समाज आधुनिकता की चपेट में आकर हीनभावना से ग्रस्त हो गया। यही कारण है कि जिन ब्राह्मों के पास थोड़ा धन हो जाता है या हो गया है वे स्वयं को दान न लेने वाला पंडित बताते हैं वे स्वयं को ब्राह्मणों के स्वभाविक वृत्त पुरोहिती से इतर के ब्राह्मण बताकर खुद को ऊंचा बताने की चेष्टा करते हैं। ऐसी हीन भावना रखना स्वयं अपना और समाज दोनों का अपमान है।
श्री मद् भगवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्तिात
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम।
अपने वृत्तिपरक कार्य को करना चाहे वह कितना ही त्रुटिपूर्ण ढंग से ही क्यों न किया जाये अन्य किसी के कार्य को स्वीकार करने और उस कार्य को अच्छी प्रकार से करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है । अपने स्वभाव के अनुसार निर्दिष्ट कर्म कभी भी पाप से प्रभावित नहीं होते।
इसलिये मैं उन धन के अहंकारी ब्राह्मणों से विनती करना चाहूंगा कि वे ब्राह्मण वृत्ति को तुच्छ वृत्ति समझने की भूल न करे । कोई ब्राह्मण यदि अपनी स्वाभाविक वृत्ति को त्रुटिपूर्ण ढंग से करेक अपने परिवार का भरम पोषण करता है। तो भी वह अत्यन्त प्रशंसनीय है।
आपसी द्वेष को मिटाकर ही प्रेम को परिपक्व किया जा सकता है. छत्तीसगढ़ी में दो कहावते हैं -
1. बाम्हन कुकुर नाउ-जात देख गुराऊँ।
2. आठ बाम्हन नौ चूल्हा।
जैसी कहावते हमारे ब्राह्मण समाज के आपसी द्वेष को ही इंगित करती है जो कभी कभी सत्य प्रतीत होती है। इसलिए आपसी द्वेष को त्यागना होगा और हमें ब्राह्मणवादी बनना होगा तभी भविष्य में हमारा अस्तित्व बना रहेगा। सौरभ कुमार दुबे, परपोड़ी

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