वर्तमान में ब्राह्मण नेतृत्व उसका अस्तित्व

भारतीय संस्कृति राजनीति एवं सामाजिक परिवेश प्रारंभ से ही ऋषिमुनियों एवं ब्राह्मणों से प्रभावित एवं संचालित रही है। प्राचीन काल में राजों महाराजों के सलाहकार एवं राज पुरोहित ब्राह्म वर्ग से ही हुआ करते थे. उनके मार्गदर्शन एवं सलाह मशविरा समय समय पर उन्हें प्राप्त होता रहता था। यह एक कटु सत्य है कि ब्राह्मण वर्ग उनका संकट मोचक की भूमिका निभाता रहा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1947 से भारतीय राजनीति में ब्राह्मण वर्ग सर्व जन हिताय की भावना से क्रियाशील रहकर सर्वमान्य एवं सर्व पूज्य रहा। यह एक यथार्थ था कि वह केवल ब्राह्मण समाज के प्रति सर्मपित न होकर संपूर्ण समजा के हित में सोच रखता था। भारत में उच्चतम स्तर पर राजनीतिक संचालन प्रारंभ से ही ब्राह्मणों के नेतृत्व में सामाजिक हित की भावना से संचालित रही। देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू ब्राह्मण नेतृत्व के अग्रणी रहे।
केन्द्रीय सत्ता हो या प्रादेशिक सत्ता राष्ट्रीय नेतृत्व में पंडित जवाहर लाल नेहरू, पंडित डी.पी. मिश्रा, पंडित उमाशंकर दीक्षित, पंडित कलापति त्रिपाठी, पंडित ललिता प्रसाद मिश्र, पंडित रविशंकर शुक्ल,पंडित दीनदयाल उपाध्याय इत्यादि नेताओं ने ब्राह्मण नेतृत्व को सर्वजन सुखाय सर्व जन हिताय नीति एवं अपने बौद्धिक कौशल से प्रशासन और राजनीति को उच्चतम एव सर्वमान्य स्तर पर पहुंचाया। इन्हीं विशिष्ट ब्राह्मण नेतृत्व के तारतम्य में अगली पीढ़ी भी सर्वमान्य सर्वहिताय रूप से कार्यरत रही, पंडित अटल बिहारी बाजेपयी पंडित श्यामाचरण शुक्ल, पंडित विद्याचरण शुक्ल के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी ब्राह्मण नेतृत्व प्रभावशाली रहा। ये नेतृत्व केवल ब्राह्मण हितों की बात न करते हुए सर्वजन की सोच से प्रेरित थे। इसी कारण सर्व समाजों द्वारा मान्य नेतृत्व बिन्दु रहे।
वर्तमान में यह दृष्टिगोचर हो रहा है कि धीरे धीरे ब्राह्मण नेतृत्व का पराभाव होता जा रहा है। अपने बुद्धि कौशल से ब्राह्मण वर्ग किसी आरक्षण का मोहताज नहीं फिर भी आरक्षण नीति ने इस वर्ग को अत्यधिक प्रभावित कर रखा है चाहे राजनैतिक दृष्टिकोण से हो या शैक्षणिक या प्रशासनिक।
वर्तमान ब्राह्मण नेतृत्व में सर्वमान्य होने की क्षमता का अभाव दृष्टिगोचर होता है, सर्वमान्य तो अलग ब्राह्मण वर्ग में भी मान्यता स्थापित नहीं कर पाए। वैसे तो राजनीति में अब भी कई ब्राह्मण नेता उच्चासीन है लेकिन वे सर्वजन हिताय की भावना से प्रेरित नहीं प्रतीत होते। यहां तक की वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य नेता पं. अटल बिहारी बाजपेयी को छोडक़र किसी और पर नजर नहीं जाती। अस्वस्था अब उनकी राह में बाधक हो गई। यदि कोई ब्राह्मण नेतृत्व है भी तो वे विभिन्न पार्टियों के साथ सीमित दायरे में कैद हो गए। कहना अनुचित नहीं होगा कि ऐसे ब्राह्मण नेता जनमानस के अलग ब्राह्मण वर्ग में ही मान्य नहीं रह गए। ब्राह्मण वर्ग मं भी विभिन्न गुटबाजी के शिकार हो गए।
ब्राह्मणों के लिे विचारणीय बिन्दु है कि व्यक्तिगत स्वर्था एवं सोच ने इस वर्ग को सर्वजन हिताय की भावना से अलग तो नहीं कर दिया। ब्राह्मण वर्ग विभिन्न पार्टी नेतृत्व की चाटुकारिता एवं हां में हां मिलाने की कवायत करने लगा ऐसा प्रतीत हो रहा है। आवश्यकता है समस्त ब्राह्मण नेतृत्व अपना पुर्नमूल्यांकन करे और विचार करे क्यों धीरे धीरे ब्राह्मण नेतृत्व का पराभाव होता जा रहा है। क्यों राज्यों की विधानसभाओं एवं लोकसभा में 70-75 प्रतिशत ब्राह्मण सदस्य होंते थे अब 7 प्रतिशत भी नहीं क्या उनकी वैचारिक सोच चाटुकारिता तक सीमित तो नही ंरग गई। क्या सही सोच या स्पष्ट राय देने में अपना हित तो नहीं आड़े आ रहा? आत्म निरीक्षण करना उचित होगा।
दूर जाने की जरूरत नहीं सोचिये कुछ वर्षों पहले तक प्रसासन में ब्राह्मण नेतृत्व का वर्चस्व रहता था प्रशासन सर्वहित की सोच से प्रेरित रहता था और अब ? इसी माह चार बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और उसके परिणाम स्वरूप ब्राह्मण वर्ग के विजेता नियमानुसार रहे राजस्थान में कुल सदस्य 199 में 7 सदस्य मध्यप्रदेश में कुल 230 सदस्यों में 17 सदस्य, छत्तीसगढ़ में कुल 90 सदस्यों में से 6 तथा दिल्ली में कुल 70 सदस्यों में 6 सदस्य विजयी
रहे । औसत देखे तो लगभग मात्र 6 प्रतिशत चारों राज्यों में सर्वब्राह्मण समाज से विजयी रहे। विचार किया जाना उचित होगा।
अजय मिश्रा, रायपुर, सलाहकार संपादक

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