विनम्रता एक अनिवार्य गुण

स्वयं की उपलब्धियों एवं सम्मान के भाव को मिटाकर मैं भाव से रहित एवं नत भाव से युक्त होकर हृदय में विद्युत के समान तत्परता एवं उत्साह का समायोजन करके जब हम अपने सम्मुख आए व्यक्ति का सम्मान करते हैं तब हमारे इस स्थायी भावजनित व्यवहार को विनम्रता कहते हैं।जब हम स्वयं को सामने खड़े व्यक्ति से तुच्छवर मानकर जो व्यवहा करते हैं तो यह हमारी विनम्रता की उचित पराकाष्ठा है जिस पर प्रत्येक मनुष्य को सदैव स्थित रहनी चाहिए।विनम्रता का गुण व्यक्तित्व की महानता का लक्षण है जो व्यक्ति जितना ही अधिक विनम्र है वह उतना ही अधिक महान है। महान व्यक्तियों का आभूषण उनकी कारण रहित विनम्रता है ।विनम्रता का गुण सभी गुणों से श्रेष्ठ माना गया है। हृदय में जब विनितता का भाव प्रस्फुटित होता है तब यह हमारे व्यवहार में परिलक्षित होने लगता है ।
संसार के महान लेखकों, कवियों एवं दार्शनिकों ने विनम्रता के गुण की अत्यन्त प्रशंसा की है । निश्चित रूप से विनम्रता धारण करने से व्यक्तित्व प्रभावशाली बन जाताह यश और मान दोनों ही बढ़ते ही जाते हैं। विनम्रता व्यक्तित्व की महानता का परिचायक है।
भगवान श्री राम महात्मा गांधी, अब्राहम लिंकन, ईश्वरचन्द विद्यासागर, जैसे महान व्यक्तियों का जीवन विनम्रता के विभिन्न उदाहरणों से परिपूर्ण है । विनम्रता छल और कपट पूर्ण नहीं होना चाहिए अर्थात यह किसी लाभ की आशा से नहीं होना चाहिए। केवल ऊपर से विन्रता प्रदर्शित करना व्यक्ति की धूर्थता कहलाती है न कि विनम्रता ।
विनम्र व्यक्ति के हृदय में विनम्रता सबी के लिए समान मात्रा में ििहत होनी चाहिए, यदि ऐसा नहीं है तो वह व्यक्ति केवल किसी लाभवश विनम्रता का ढोंग अर्थात चापलूसी करता है । विनम्रता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि किीस के अत्याचार या अन्याय को शांति से सहन करना यदि हम इसे अपनी विनम्रता समझते हैं तो यह हमारी भूल है। यह हमारी विनम्रता नहीं बल्कि हमारी मानसिक व शारीरिक कमजोरी है, एक भ है हमारा दब्बूपन है जिसे हम विनम्रता के आड़ में छुपाने की चेष्टा करते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए ।
क्षमाशीलता दब्बूपन और विनम्रता तीनों अलग है । इसे हम आत्म विश्लेषण से जान सकते हैं कि हम किस भाव में जी रहे हैं । नि:संदेह क्षमाशीलता एक महान गुण है परंतु इसकी भी एक सीमा होनी चाहिए । ऐसा न हो कि हम अपने दब्बूपन की वजह से खुद को क्षमाशील घोषित करके अंदर ही अंदर जलते रहे । प्रतिशोध की अग्नि में खुद को जलाते रहने से अच्छा है कि हम अपनी बात अपना विरोध सही ढंग से प्रस्तुत करें।
स्वयं के प्रति किये गये अपराधथ अत्याचार एवं अन्याय का यथोचित विरोध करने की हिम्मत भी हममे होनी चाहिए और यदि नहीं है तो कम से कम हम इसे विकसित करने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। हमें सभी से विनम्रता के साथ अवश्य ही मिलना चाहिए साथ ही हमें यह जानने की कोशिश भी कर लेनी चाहिए कि सामने खड़ा व्यक्ति हमारी विनम्रता के योग्य है कि नहीं? कहीं वह इसका फायदा तो नहीं उठ ारहा है? इसतरह से हम खुद को एक सही एटीट्यूड वाले व्यक्ति के रूप में पहचान दिला सकते हैं । सौरभ दुबे,परपोड़ी साजा दुर्ग