अप्रैल-2009

yuva

shub kamnaye

रवीन्द्र नाथ अवस्थी संपादक के नाम पत्र

श्री रामू प्रसाद शर्मा जी का वक्तव्य एक मुलाकात जनवरी 2009 ङ्खख़् के अंक में पढ़ा । इस वक्तव्य पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं रोक पा रहा हूं । शर्मा जी ने कहा है कि उन्होंने ब्राह्मणों की एकता के लिए बहुत परिश्रम किया है। पूरे म.प्र. में एक छोर से दूसरे छोर तक प्रयास किया है । शर्मा जी इसी वक्तव्य द्वारा छत्तीसगढ़िया और गैर छत्तीसगढ़िया ब्राह्मण का भेदभाव बढ़ा रहे हैं । शर्मा जी ने यदि पूरे म.प्र. के सभी ब्राह्मणों की एकता का प्रयास किया है तो स्थानीय भेद भाव की बात हास्यास्पद है ।  read more »

डॉ. बी.एन. शर्मा संपादक के नाम पत्र

आपका मार्च 2009 का मासिक पत्रिका सधन्यवाद प्राप्त हुआ । आपको अनेकानेक साधुवाद, आपके सभी ब्राह्मणों को एक सूत्र में बांधने नि:स्वार्थसेवा हेतु आपको बहुत बहुत बधाइयां ।  read more »

ज्ञानसंधु पाण्डेय संपादक के नाम पत्र

प्रभु एवं डाक विभाग की अनुवस्था से विप्र वार्ता का फरवरी अंक आज प्राप्त हुआ । फरवरी अंक वैवाहिक विशेषांक के रूप में प्रकाशित कर आपके द्वारा विप्र समाज की एक बहुत बड़ी समस्या के समाधानहेतु सार्थक प्रयास अत्यंत सराहनीय कदम है और आश  read more »

आनंद बिल्थरे संपादक के नाम पत्र

विप्र वार्ता का जन 09 अंक प्राप्त हुआ । मुख पृष्ठ पर दोनों चित्र एवं संपादकीय पढ़कर प्रसन्नता हुई । एकजुट होकर गुमनाम लोगों ने अपनी पहचान बनाती है । आज उनकी आवाज प्रांतीय राजधानियों के दिल्ली तक गूंज रही है । इसके विपरीत ब्राह्मणसमाज टुकड़ों टुकड़ों में बंटा केवल अपने अतीत के साथ अकेला खड़ा है ।  read more »

अरूणकुमार शर्मा - संपादक के नाम पत्र

भाटापारा नगर आगमन पर सर्व ब्राह्मण समाज की ओर से आपका एवं अन्य पदाधिकारीगण का हार्दिक अभिनंदन करता हूं । आपका प्रयास सराहनीय है कि आज के समय में आपने क्षेत्रीय बटे हुए ब्राह्मणों को एक माला में पिरोने का कार्य कर पूरे ब्राह्मण समाज को एक नई राह दिखाई अब समाज का दायित्व है कि उसे स्वीकार करें तन मन धन से सहयोग करे । मेरा पूर्व में भी यह वक्तव्य था कि आज भी छत्तीसगढ़िया / परदेशिया की बात जीवित है कि उसे इतिश्री करना अति आवश्यक है जबकि सभी यह जान रहे हैं कि छत्तीसगढ़ कोल भील आदिवासियों का गढ़ है ।

यहां सभी जातियों ने जीवकों पार्जन के उद्देश्य से आकर शरण ली फिर छत्तीसगढ़िया परदेशिया की बात करना कितना उचित है। सर्व प्रथम इस सोच का बदलाव आवश्यक है इसे समग्र ब्राह्मणसमाज निर्णय करता है तो मुझे उम्मीद है कि इसे सभी विप्र साथी स्वीकार करेंगे तो आज जो दिमाग में अशिक्षित, अज्ञानी लोगों की सोच जो स्थित है बाम्हन ठाकुर नाऊ जाति देख गुर्राऊ यह बात अपने आप समाप्त हो जावेगी रही रोटी बेटी की बात तो यह विप्र बंधु की स्थिति पर निर्भर है । कि उसे स्वीकारे या न स्वीकारें वैसे सभी जातियों में अमीर, गरीब, फकीर किस्म के इंसान रहते हैं , और इस संसार में कोई भी कार्य किसी का नहीं रूकता सबका कार्य ईश्वर पूरा करते हैं अमीर का अमीरी से गरीब का गरीबों से और फकीर का फकीरों से ।  read more »

महिला मंडल होली मिलन

शक्ति छत्तीसगढ़ी विप्र महिला मंडल द्वारा आमापारा स्थित सामुदायिक भवन में होली मिलन का आयोजन किया गया। आज बिरज में होली. मांग भर होली रे.. होली खेले रघुवीरा अवध मे. रंग बरसे भीगे चुनर.. अरे जा रे हट नटखट.. आज ना छोड़ेंगे, जैसे गीतों को मादर की थाप पर बजाते हुए महिलाएं होली का जमकर आनंद ले रही थी । पूरा माहौल ब्रज और अवध के समान लगने लगा । होगी की बारी तो महिलाओं ने एक दूसरे पर फूलबरसा कर और गले मिलकर होली की शुभकामनाएं दी ।

राजस्थानी गौड़ ब्राह्मण महिला मंडल द्वारा आयोजित होली मिलन में सारी महिलाएं कान्हा की भक्ति में खोई नजर आई । माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बनाने के लिए महिलाओं ने बच्चों को राधा और कृष्ण का रूप देकर उनके साथ रास लीला का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया। बिगड़ गया नंदलाल. काहे दियो कान्हा से.. आगे आगे गैय्या.. और म्हारो मदन गोपाल.. जैसे गीतों ने महिलाओं को मंत्रमुग्ध सा कर दिया । कान्हा की भक्ति में महिलाएं पुरी तरहसे रमी नजर आई । अबीर, गुलाल और फूलों को मिलाकर कान्हा और राधा के सात मिलाकर जमकर होली खेली ।  read more »

सद्भावना यात्रा के उद्देश्य को आत्मसात करें

देश की गरीबी के पीछे जाति का बहुत बड़ा हाथ है । देश की 80 फीसदी जनता आज भी अपने मन में सदियों का भाग्यवाद का बोझ सह रही है और सोचती है कि उसकी बुरी हालत के लिए उसका निकम्मापन या दूसरों की लूट नहीं, पिछले जन्मों के उसके कर्म है , महात्मा गांधी ने अछूतों को नया नाम दे कर हरिजन कहा पर उससे फायदा नहीं हुआ क्योंकि एक गांधी के मुकाबले लाखों जाति के पुजारी पांडे यह साबित करने में लगे थे कि नाम बदलने से जाति नहीं बदलती ।

जाति के बिचौलिए, दलितों को ही नहीं, सभी जातियों को इसकी जकड़न में रख रहे हैं , कुछ तो यह साजिश है कि देखो ऊपर के लोग भी तो जाति मानते हैं, फिर नीचे वाले क्यों नहीं माने, अग्रवाल लोग बंसल, कंसल, रोहतगी, गुप्ता, गर्ग के चक्कर में है, ब्राह्मणों ने अपने को गौड़ सांडिल्य, मैथिल, कान्यकुब्ज, सरयूपारीय, कौशिक जैसे टुकड़ों में तो फिर दलित, जाटव, धरकार अधर्मा, रामसरनी, यादव, कुर्मी, थमैला, अवैद्य क्यों नहीं अपने को हिस्सों में बंटा देख कर चुप रहेंगे । हम लोग न केवल 8-10 मोटी जातियों में बंटे हैं , हर जाति सैकड़ों हजारों टुकड़ों में बंटी है, हर टुकड़ा अपने आप को भाग की देन समझता है, अपनी गरीबी को भगवान की देन समझता है , उससे लड़ कर उसे खत्म करने की जगह, उसे बचा कर रखना अपना फर्ज समझता है।  read more »

Syndicate content