शिक्षा और संवाद की भाषा क्या हो?

कोई भी जागृत समाज अपने लिए श्रेष्ठ विकल्पों का ही चयन करता है। समाज के लिए जागृति में यह तय करना चाहिए कि उसकी शिक्षा और संवाद की भाषा क्या हो? हमारे देश में 190 साल की अंग्रेजों की गुलामी ने हमारी सोच, प्रक्रिया, भाषा, जीवनशैली सब पर असर डाला है । आजादी के इन सालों में भी हम उस मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके। जब हमारे पास संस्कृत सहित न जाने कितनी भारतीय भाषाओं और बोलियों का जीवंत संसार है तो हमने क्यों विदेशी भाषा की बेडियां डाल रखी हैं? आज सभी देश अपनी मूल भाषाओं में काम करने लगे हैं, वे अपने अवसर और संभावनाएं ढूंढ़ रहे है किंतु अफसोस कि हमारे लोग इसे नहीं समझते। शिक्षा व संवाद भारतीय भाषाओं में होना चाहिए इसके लिए निर्णायक लड़ाई लडऩे की और उसके लिए कार्य योजना बनाने की जरूरत है।
बच्चे के जन्म के समय जो भाषा उसके साथ होती है, वही उसकी शिक्षा के लिए सबसे उपयोगी है। जन्म और शिक्षा की भाषा अलग होने से सीखने की निरंतरता पर आधात पहुंचता है। कई बच्चे इसे सह नहीं पाते और वे सिर्फ एक भाषा के नाते जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। संचार की भाषा में स्थानीय संस्कार ही उसे प्रवाहमान और समृद्ध बनाते हैं। भाषा एक स्टापडेम की तरह न हो वह पुण्यसलिला की तरह प्रवाहित होनी चाहिए। हिंदी में अंग्रेजी की अतिवादी घुसपैठ ठीक नहीं है, किंतु सहजता से कुछ आ रहा है तो उसे स्वीकारना चाहिए। हिंदी और भारतीय भाषाओं में इतनी शक्ति है कि वे सबको साथ लेकर चल सकती हैं।
हमारे देश में योजनापूर्वक यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि अंग्रेजी के बिना किसी व्यक्ति और राष्ट्र की प्रगति नहीं हो सकती। तो यह सवाल उठता है कि जापान, चीन, जर्मनी, इजरायल ने प्रगति क्या अंग्रेजी के बल पर की है। हमें भ्रम के बादल हटाने और हवा का रूख मोडऩे के लिए काम करना होगा। यह काम भारतीय भाषाओं की एकता से ही हो सकता है। हमारी संस्कृति सभ्यता और भाषा का एक अभूतपूर्व गढज़ोड़ है । हमारी भाषा और वेद लिपि संस्कृत में लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषि मुनियों ने सब कुछ लिख दिया है और पुष्पक विमान जैसे सफल प्रयोगों का वर्णन वेदों में निहित है जिससे ही प्रेरणा लेकर विज्ञान के बहुत सारे सफल प्रयोग वैज्ञानिकों ने किये हैं । आइये हम अपनी उन्नत मात्र भाषा का अधिकतम प्रयोग करे और मातृभाषा हिन्दी और देव लिपि संस्कृत को जन-जन की भाषा में अपना योगदान सुनिश्चित करें ।
हेमन्त तिवारी, सदस्य संपादक

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