संस्कृत के विकास से प्राचीन गौरव

संस्कृत भाषा के विकास से ही भारत को विश्वगुरू का प्राचीन गौरव मिलेगा। भारत को अगर अपना प्राचीन गौरव हासिल करना है तो संस्कृत को प्रोत्साहन देना ही होगा। क्योंकि संस्कृत से ही संस्कृति का विकास हुआ है।यह विचार नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री बाबूलाल गौर ने एनआईटीटीटीआर में व्यक्त किए। वे यहाँ अखिल भारतीय संस्कृत सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
इस अवसर पर सांसद कप्तान सिंह सोलंकीए महर्षि संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष डॉ ण्मनमोहन उपाध्याय विशेष अतिथि थे।श्री गौर ने संस्कृत को प्रोत्साहन दिए जाने की पुरजोर वकालत की,कहा कि भारतीय संस्कृति की महानता को विश्व के अनेक विद्वान भी स्वीकारते हैं। देखा जाऐ तो देश को देश की संस्कृति ने ही आजाद कराया है। उन्होंने कहा कि संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो भारत को उसके विश्वगुरू होने के गौरव को वापस दिला सकती है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सांसद कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि भारत वर्ष को भारत बनाने के लिए संस्कृत का प्रचार.प्रसार जरूरी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने देश के प्राचीन गौरव को पुन: स्थापित करने के लिऐ कई कदम उठाए हैं। इनमें संस्कृत भाषा के प्रोत्साहनए हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापनाए शासकीय स्कूलों में गीता सार की पढ़ाई आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। प्राचीन भारत के अधिकांश शब्दों की रचना संस्कृत से ही हुई है। प्राचीन एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान की जानकारी में संस्कृत समन्वय का कार्य करती है।
आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि मध्यप्रदेश देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जो प्रसिद्ध संस्कृत विद्वानों की जन्म व कर्म भूमि रहा है। इनमें प्रमुख रूप से महर्षि वाल्मीकीए कवि कालिदास, जाबालि ,ऋषि बाणभट्ट, आदि शंकराचार्य, भतृहरि आदि शामिल हैं। राजगढ़ के झिरी ग्राम के निवासियों की आम बोलचाल की भाषा अभी भी संस्कृत ही है।

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