संस्कृत विद्यालय की पढ़ने- पढ़ाने की शैली अनूठी है-विनोद शास्त्री

बिलासपुर । श्री निवास संस्कृत महाविद्यालय में कांशी से पधारे हुए संस्कृत के आचार्य पं. श्री विनोद शास्त्री जी ने छात्रों एवं अध्यापकों के बीच अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहे । श्री शास्त्री जी ने विस्तार से इसकी चर्चा करते हुए कहा कि इस विद्यालय के बहुत से पढ़े हुए छात्र काशी में है । जिनका संपर्क संबंध मुझसे है , ऐसे छात्रों के द्वारा मुझे बिलासपुर के इस संस्कृत विद्यालय के विषय में जानकारी मिली कि इस विद्यालय के छात्रों को रटने की मनाही है , तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ । विश्वास न होने के 2 प्रमुख कारण है । प्रथम यह कि मैं रट कर ही पढ़ा हूं और भी जो लोग पढ़ रहे हैं रटकर ही पढ़ते हैं, मैं स्वयं पढ़ाता हूं और जिन्हें पढ़ाता हूं उन्हें रटने के लिए कहता हूं । अत: मेरे लिए बिना रटे भी संस्कृत पढ़ी पढ़ाई जा सकती है, यह विश्वास कर पाना कठिन है क्योंकि स्वानुभव इसके विपरीत है, किन्तु मैं जब यहां आया और छात्र जो कि नये आये हैं, जुलाई में जिन्हें आये केवल6 ङ्ढ माह हुए हैं उनसे लघु कौमुदी के प्रयेक्ष पूछा तो उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से सभी प्रश्नों का समाधान किया ।

अपने मन के समाधान के लिए मैंने पुन:5 ह्न वीं पास करके आये छोटे- छोटे नये छात्र सोनु कुमार जोशी एवं आकाश मिश्र से इको यणचि इस पाणिनी सूत्र के विषय मे ंपूछा जिसका उन दोनों छोटे छात्रों ने पद पदार्थ का विवेचन करते हुए उत्तर दिया जो कि मेरे लिए अत्यन्तअह्लादकारी च्ह्लर्लैृढलद्मर है। इस सूत्र के अर्थ में संहिता के विषय में कहा जाता है जबकि सूत्र इको यणचि में संहिता शब्द नहीं है फिर अर्थ में यह कैसे आ गया, पूछने पर उन छोटे बच्चों ने जो यह बतलाया कि संहिता शब्द की पर: संन्निकर्ष संहिता से अनुवृत्ति आई है, उनकी इस बात को सुनकर मैं आश्चर्य चकित रह गया, मन खुस हो गया, चित्त प्रसन्नता से झूम उठा ।
मैने कांशी में इस विद्यालय के विषय में जो भी जितना भी सुना था उससे भी कई गुना आगे श्रेष्ठ इस विद्यालय को पाया । इस विद्यालय की पढ़ने पढ़ाने की शैली अनूठी और अद्भुत है । दूसरा कारण यह है कि इस विद्यालय में निर्धारित ग्रंथो ंके साथ ही श्री पाणिनी मुनि विरचित अष्टाध्यायी एवं धातु पाट भी पढ़ाया जाता है। अन्य सभी संस्कृत विद्यालयों में चाहे वे काशी के ही क्यों न हो, निर्धारित पाठयक्रम ही पढ़ाया जाता है । यही कारण है कि यहां के पढ़ने पढ़ाने की शैली अनूठी है । संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य श्री निवासाचार्य ने पं. विनोद शास्त्री जी का शाल उड़ाकर सम्मान किया ।
थोड़े समय में ज्यादा ज्ञान, बिना रटे हो पूरा ज्ञान5
ह्न वीं,8 ख़ वीं पास छात्र बिना एक भी अक्षर रटे हुए थोड़े समय में ही संस्कृत का प्रौढ़ ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । कन्याओं के लिए अलग व्यवस्था है । वे बिना रटे थोड़े ही समय में संस्कृत सीख सकती है । संस्कृत प्रचारार्थ नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है ।
संपर्क करें - श्रीवेङ्कटेश्वर ल्उक्ढभउअल्द्म संस्कृत प्रचार समिति
श्रीवेङ्कटेश ल्उक्ढभउब मंदिर, सदर बजार, बिलासपुर (छ.ग.)

Tags: