समाजिक एकता का प्रतीक उत्सव: होली

पंडित राघवेन्द्र पाठक,होली

हमारा देश संस्कृति प्रधान देश होने के साथ-साथ उत्सव प्रिय देश भी हैं। ‘‘उत्सव प्रियः खलु मनु याः’’ अर्थात् मनुश्य उत्सव प्रिय प्राणी है। उत्सव यानि मनुष्य को उन्नत बनाने वाला, द्विज बनाने वाला संस्कार मुक्त त्यौहार जन्मना, जायते शुद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते इस प्रकार हमारे यहॉ हर उत्सव और त्यौहार हमारे उत्कृष्ट मार्गदर्शक होते हैं। होली भी हमको राग द्वेष, झूठ तर्क वितर्क और उंच नीच के भेदों को जलाकर मानवता का पाठ सिखाती है। संस्कृत ‘होलका’ अधप के अन्न को कहते है। वैधक के अनुसार ‘होला’ स्वल्प बात हैं और भेद, कफ तथा थकावट को मिटाता हैं। होली पर जो अधप के चने या गन्ने की लाठी मे बांधकर जलती हुई होली की लपट में सेंककर खाये जाते हैं, उन्हें ‘होला’ कहते हैं। कहीं-कहीं अधप के नये जौ की बालें भी इसी प्रकार से की जाती हैं। संभव हैं फाल्गुन सुदी पुर्णिमा को मनाया जाने वाला त्यौहार बसंत के आगमन पर षरीर के किसी प्राकृतिक विकार को दूर करने के लिए होला चबाने की चलन रही हो और उसी के संबंध में इनका नाम ‘होलिका’ ‘होलका’ या ‘होली’ पड़ गया हो। होली का एक नाम ‘वासन्ती नवषस्योश्टि’। इसका अर्थ हैं वसन्त में पैदा होने वाले नये धान का ‘यज्ञ‘ होता है, यह कहना अनुचित नहीं होगा की ऋतु परिवर्तन कारण जो प्राकृतिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं वह होली नामक यज्ञ के द्वारा धुएॅ से वायु की शुद्धी हो जाती। होली के दिन जिस जगह काठ-कंडे इकट्ठे करके उसमें आग लगायी जाती हैं, उस जगह को पहले साफ करते हैं पूजत है और समूह में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति होम की सामग्री धर में मालाओं के रूप में गूथ कर चाहे वह अनाज हो या फिर गोबर की बल्लियांे की माला उसमें होम करते है। शुभ माने जाने वाला नारियल भी होम किया जाता है।
होली के संबंध मे कई पौराणीक कथाओं का वर्णन मिलता है, जिसमें मुख्य नरसिंह पुराण एवं श्री गर्ग संहिता में मिलता है। नरसिंह पुराण के 40 वें अध्याय से 44 वें अध्याय तक उल्लेख हैं कि भक्त राज प्रहलाद कि अग्नि परीक्षा इसी दिन हुई थी। प्रहलाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकाषिपु ने अपनी बहिन ‘होलका’ से प्रहलाद को जला देने के लिए कहा। ‘होलका’ को यह वरदान प्राप्त था कि भगवान के भक्त को न सताने तक अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। इस वरदान का दुरूपयोग कर होलका राक्षसी प्रहलाद को गोद में लेकर काठ के ढे़र पर बैठ गई, और अन्य राक्षसों ने उस ढ़ेर में चारों तरफ आग लगा दी। प्रहलाद भगवान के अन्नय भक्त थे, वे भगवान का नाम रटने लगे। भगवत कृपा से प्रहलाद के लिए अग्नि षीतल हो गई और वरदान की षर्त के अनुसार ‘होलका’ उसमें जल मरी। भक्त राज प्रहलाद इस कठिन परीक्षा मे उत्तीर्ण हुए और आ कर पिता से कहने लगे।
राम नामके जापक जन हैं तीनोें लोकों में निर्भय।
मिटते सारे ताप नामकी औशध से पक्का निष्चय।।
नहीं मानते हो तो मेरे तन की ओर निहारो तात।
पानी-पानी हुई आग हैं जला नहीं किंचित भी गाता।।
इन्हीं भक्त राज और इनकी विषुद्ध भक्त का स्मारक रूप यह होली का त्यौहार हैं। हिरण्यकषिपु के राजत्व काल में आत्याचारिणी होलका का दहन हुआ भक्ति तथा भगवान नाम के अटल प्रताप से दृश्व्रत भक्त प्रहलाद की रक्षा हुई और उन्हें भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन हुए। इस दिन की स्मृति में तब से लेकर अब तक हिन्दु फाग से एक दिन पहले होली जलाते है। होली के अवसर पर कृशिकों की फसल पकी हुई होती है। कृशक उसे देखकर झूम उठते है। वे अपनी फसल की बालों को आग में भूनकर उनके दाने मित्रों व सग संबंधियों में बांटते है, सभी वर्ण के लोग भेद छोड़कर परस्पर मिलते-जुलते हैं, चारों ओर रंग और गुलाल का वातावरण दिखाई पड़ता है। लोग ढोल-मंजिरें बजातें मस्ती मे गाते नाचते और झुमते हुए नजर आते हैं। होली का रंग जमाने के लिए नाच गाने, हास्य, कवि-गोश्ठियॉ, होली मिलन का आयोजन किया जाता हैं।
वैसे तो समस्त भारत में होली मनायी जाती हैं। परन्तु मथुरा से 35 मील दूर ‘बरसाना’ में भादों सुदी अश्टमी (श्री राधाकिषोरी की जन्मतिथी) चतुर्दषी तक बहुत सुन्दर मेला होता है। इसी प्रकार फाल्गुन षुक्ला अश्टमी, नवमीं एवं दषमीं को होली की लीला होती हैं।
श्री गर्ग संहिता के मार्धुयखण्ड के 12 वें अध्याय में श्री राधा किषोरी को सूचना मिलती हैं कि बृजभूशण नन्दन तुम्हारी बरसाना नगरी के उपवन में होलिकात्सव विहार करने के लिए आ रहें हैं। उन्होंने हाथ में नयी पिचकारी ले रखी हैं तथा अबीर और केसर के रस से उनका सारा अंग लिप्त है। श्याम सुन्दर तुम्हारे षीध्र निकलने की राह देखते हुए पास ही खड़े हैं। उठो और सहसा अपनी सखी मण्डली के साथ उस स्थान की ओर चलो तब मानवती राधा मान छोड़कर उठी और सखियों के समूह से घिरकर होली का उत्सव मनाने के लिए निकली। चन्दन, अगर कस्तुरी हल्दी तथा केसर के घोल से भरी हुई डोलचियॉ लिये वे हास्य युक्त गलियों से सुशोभित होली के गीत गा रही थी और अबीर, गुलाल के चूर्ण मुट्ठियों में ले-लेकर इधर-उधर फेंकती हुई वे उस स्थान पर पहुंची तब श्री कृष्ण ने वहॉ जितनी गोपियॉ थी, उतने ही रूप धारण करके उनके साथ विहार करते रहे।
संभव हैं सभी का कुछ-कुछ अंश मिलकर यह त्यौहार बना हो पर आज कल जिस रूप में यह मनाया जाता हैं। उससे तो धर्म देश और मनुष्य जाति को बड़ा ही नुकसान पहुंच रहा हैं। हमें चाहिए कि होली में डालें जाने वाले लाल हरें रंग हमें सिखाते हैं कि जिस तरह हर रंग एक-दूसरे में मिलकर इंद्रधनुष सी खुशियॉ देते हैं। उसी तरह हमें भी अपने हर भाव और हर विचार से एक-दूसरे समाज और पूरे देश को सदविचारों के साथ खुशियॉ बांटना चाहिए, ताकि हम मजबूत बने और राग द्वेष और स्वार्थ के धरातल से ऊँचा उठकर सही मानवता की छवि पेश करें।
पंडित राघवेन्द्र पाठक
खम्हारडीह, रायपुर (छ.ग.) मो. 09303864412

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