समाज से सब कुछ चाहिए.........

ajay tripathi,tripathi ,yuva,vipra

समाज हमारे लिए क्या करता है, जो हम समाज के लिए करें ये ऐसे विचार है जो हर वह व्यक्ति व्यक्त करता है जो जीवन में कहीं न कहीं सफल है। चाहे व बड़ा अधिकारी हो राजनेता या व्यापारी । हर किसी को समाज से सब कुछ चाहिए लेकिन देने की बात नहीं करिये हम सभी साथी पिछले 7 सालों निरंतर विप्र वार्ता का प्रकाशन कर रहे हैं,पर आप सभी महानुभावों जिन तक विप्र वार्ता पहुंचती है वे अपने दिल पर हाथ रख कर एक ठंडी सांस लेकर विचार करें कि क्या हमने इसकी सदस्यता दी है। क्या हमने इसके सहयोग के लिए एक-आध विज्ञापन दिया है ।
2008 की बात है हम लोग हमारे प्रदेश के दूसरे छोर के जिले में परशुराम सद्भावना यात्रा लेकर गया था वहां एक बैठक में समाज के सभी जिम्मेदार लोगों ने प्रकाशित विज्ञापनों पर आपत्ति दर्ज कराई,कहा गया कि एक राजनेता की फोटो हर बार छपती है हमने वास्तविक तथ्य सामने रखे। उन्होंने हमें वचन दिया कि इस जिले से हम शीघ्र बड़ी राशि सदस्यता के रूप में जमा कर भेजेंगे । इस जिले में अब भी उन्हीं सभी सज्जनों के साथ लगभग 60-70 प्रतिया हर माह पोस्ट होती है लेकिन 2008 से आज 2013 हो गया । इन पांच सालों में प्रति वर्ष 10 के हिसाब से 50 सदस्य भी नहीं बने । इसी प्रकार प्रदेश के एक वरिष्ठतम गांधी वादी आई.एस. अधिकारी के निवास पर सन 2006 से निरंतर प्रकाशित यह पत्रिका प्रथम अंक से आज तक जा रही है । प्रदेश के दो -दो बड़े विभागों के प्रमुख जिनका प्रदेश के बजट में बड़ा योगदान रहता है जिसके ठेकेदारों की तूती पूरे प्रदेश में बोलती है इन महाशय से हम 4-6 माह पूर्व ढाई घंटे के लंबे इंतजार के बाद जब मिले तो उन्होंने पहले तो ऐसे किसी पत्रिका की जानकारी से इंकार ही कर दिया जब बताया गया कि जब हमने आपके पिता जी आपका और आपकी प्रतिभाशाली पुत्री की उपलब्धियां हमारी पत्रिका में प्रकाशित की है तो दबाव में पत्र ले लिया लेकिन उसे जहां पहुंचना था वहां पहुंचा ही नहीं। एक डेढ़ माह इंतजार के बाद पुन: जब मुलाकात की तब फिर वही हश्र हुआ जो पहले पत्र का । आज तक इन तेजतर्रार अधिकारी की टीप वाला पत्र छोटे मोटे विज्ञापन के आदेश में तब्दील नहीं हो सका है। ऐसे ही एक और क्षेत्र में चर्चित हमारे प्रदेश के प्रमुख विभाग के प्रमुख पद पर हमारे बिरादरी के अधिकारी आसीन हुए तो दोहन के मशहूर इस अधिकारी तक हम पहुंचे । महोदय ने बड़ी ही तारीफ हमारी और अपनी भी की। कहा कि मैं जानता हूं आप लोग बड़ा और अच्छा काम कर रहे हैं । हमारी फलानी ..... ने भी बताया था कि आपका काम काबिले तारीफ है । हम लोग जब पूर्व प्रदेश की राजधानी में थे तो वहां बड़ा सामाजिक कार्य फला राजनेता के साथ ...... काम किये और वही कहानी एक दो माह इंतजार के बाद जब फिर पुन: पुन: रिमाइंडर किया गया तो सहयोग के दूसरे तरीके का सहारा लेने की बात कही और उसके बाद भी 3-4 माह से वो पत्र भी पते में पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं । कई अधिकारियों का यही हश्र है ।
हमारे प्रदेश के राजनेता जिनके हाथ में एक प्रमुख पार्टी की कमान है उनसे हमारी जब मुलाकात होती है तो उन्हें निवेदन पत्र सौंपते और हर बार एक जवाब देते, कहां से करूं यहां से कोई विज्ञापन नहीं निकलता । स्वयं राजनेता पूर्व पत्रकार हैं को क्या मुझे बताना पड़ेगा गत 5-6 माह पूर्व एक आयोजन के संदर्भ आमंत्रण के साथ दिये निवेदन पत्र पर पहली बार उन्होंने कहा कि चलो मैं इसे करवाता हूं। और हम अभी तक इंतजार कर रहे हैं । एक अन्य नेता जिन्हे हमने प्रारंभ से प्रमुख पद पर रखा और उनसे जब सहयोग की बात की तो उनका जवाब था कि फला जगह जहां मैं काबिज हूं वहां यह अधिकार ही नहीं है उनके दो टूक जवाब से कम से कम हमें आशा तो नहीं रही। एक बड़े वित्तीय संगठन के प्रमुख ने जब हमारे समाज के प्रमुख के फोन से विज्ञापन छापने के मौखिक आदेश तो दे दिये पर बिल लेने पिछले 4 सालों से भुगतान के लिए हम घुम रहे हैं। ठीक ऐसा ही वाक्या शहर के चर्चित समाज के सबसे बड़े व्यापारी जिनके बड़े बड़े विज्ञापन, होर्डिंग लगते हैं के पास हम लोग सन 1995-96 जब से शहर का एकमात्र परशुराम जयंती का आयोजन हम लोग कर रहे हैं । तो प्रचार के शौकीन, अपनी प्रचार वस्तु बंटवाने के साथ पांच सौ रूपये का चंदा देते थे । 2 साल -3 साल -10 साल तक जब यह मंहगाई 10 गुना हो गई तब भी बारम्बार निवेदन के बाद जब महोदय की इच्छा राशि बढ़ाने की नहीं हुई तब हमने उनसे सहयोग लेना ही बंद कर दिया । लेकिन वे आज तक सहयोग का विचार नहीं बना पाये ।
यहीं हमारी बात खत्म नहीं होती हम लोगों ने विचार किया कि हमारे बड़े बड़े पत्रकार, साहित्यकार जिनका लोग पढ़ते हैं । जो प्रमुखता से छपते हैं उनसे विचार कर एक बैठक आयोजित की जाय। सामाजिक चिंतन और सार्थक लेखन सामाजिक कठिनाईयों पर करने निवेदन किया जाय तो हम पहुंचे इस प्रदेश के वरिष्ठतम पत्रकार रहे पिता के सेवानिवृत्त आई.ए.एस. से साहित्यकार बने अधिकारी के पास जिन्होंने दो टूक जवाब दिया मेरे पास समय नहीं है। मेरे प्रोग्राम बड़े-बड़े और साल 6 माह पूर्व ही निर्धारित हो जाते हैं। फिर हमने एक और प्रमुख राजनेता जिनसे इस प्रदेश की पहचान है के निकटवर्ती वरिष्ठ पत्रकार से निवेदन किया जिन्होंने सारे जीवन अपने उस राजनेता से रिश्तों का लाभ उठाया अपने अल्प ज्ञानी पुत्र को देश में प्रदेश को पहचान देने वाले प्रमुख संस्थान में आऊट आफ टर्न नौकरी दिलवायी इन पत्रकार का जवाब था कि मेरा लेखन एक समाज विशेष के लिए नहीं है।
भाईयों विचार करें हम कहां खड़े हैं आज हमारे युवा के समाने कितनी समस्याएं है । हमारे कर्मचारी जातिगत पदोन्नति से अपने से जूनियर आरक्षण प्राप्त कर्मचारी के अधीन काम करने विवश हैं। 90-95 प्रतिशत अंक पाकर भी हमारी धरोहरे स्थान नहीं बना पा रही है । जबकि आरक्षित वर्ग सुविधाओं और आरक्षणों से कहां से कहां पहुंच रहा है । राजनेताओं को केवल वोट और अपनी कुर्सी दिखती है। बड़े अधिकारी, व्यापारी, पत्रकार, साहित्यकार अपने अपने मुकाम से खुश हैं। और हमारा मध्यम वर्गीय गरीब ब्राह्मण योग्यता रखकर भी मंजिल खोज रहा है, न ये सरकारे उसकी है और न हमारे समाज के तथाकथित बड़े लोग। चिंतकों को इस बात की भी प्रवाह नहीं हो रही है कि सुविधा तो ठीक है सहयोग जरूरी है । लेकिन योग्यता को बलाये ताक में रखकर देश का भविष्य क्या उज्जवल होगा ....?
आइये विचार करे और सामाजिक समस्याओं को व्यापक दृष्टिकोण से देखकर इस लड़ाई से अपने स्वार्थ को दूर रखें तभी हमारा उद्धर होगा। तभी देश का भविष्य उज्जवल होगा ।

आलोक पाण्डेय
सदस्य संपादक एवं अध्यक्ष कर्मचारी संघ

Tags: