सामाजिक एकता और संस्कृति

ार्मिक सद्भाव, सहयोग पर्व, उत्सव , कला और साहित्य संस्कृति के अंग है । इनका आदान प्रदान संस्कृति एकता को जन्म देता है । संगठन की एकता अखण्डता एक समाज का जीवन और समृद्धि के लिए अनिवार्य है । जो समाज अपने पैरों पर खड़ा होना जानता है वह कभी परास्त नहीं हो सकता । जो समाज दूसरों पर निर्भर रहता है वह लोगों पर भार अपने आप ही बन जाता है युवाओं की साहस की परीक्षा का समय आ गया है । भटकाव से मुक्त होकर संगठन के प्रति जागरूकता के साथ कार्य करें।
युवकों को अन्यायपूर्ण प्रस्ताव चाहे अन्तर्जातीय हो या अन्य किसी लोभ लालच में आए बिना अपने समाज संगठन का हित देखकर असवीकार कर देना चाहिए । इससे संगठन का गौरव बढ़ेगा तथा समाज उन्नति की ओर अग्रसर होगा । आज युवा वर्ग पथभ्रष्ट अनुशासनहीन और अनुत्तरदायी बन गया है । हमें संस्कृति को जीवित रखने की आवश्यकता है इसके लिए संगठन की ओर से कठोर कदम उठाने के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए । जिस दिन युवा पीढ़ी के बारे में संगठन व समाज का चिन्तन होगा उस दिन सामाजिक संगठन का भविष्य सुरक्षित एवं सुनहरा रहेगा।सांस्कृतिक एकता की भावना से ओत प्रोत व्यक्ति संगठन निर्मात हुआ करते हैं । आज का युग चुनौतियों का युग है, इसमें सिर्फ संगठन का ही दायित्व नहीं बल्कि संस्कृति को जीवित रखने के लिये दायित्व बुजुर्गो के साथ युवा वर्ग का भी बनता है । सभी अपने-अपने कत्र्तव्यों से परिचित रहे व पालन करे , इतिहास गवाह है सदैव युवा वर्ग ने मानवीय मूल्यों को अपनाया है। अन्याय शोषण और उत्पीडऩ के खण्डहरों पर युवा हाथों से ही आजादी का
गौरव मंगल पाण्डेय स ेलेकर आज तक बलिदान हुए युवा है । जवानी उसकी आयु का चरम क्षण होता है । जवानी की उमंगे सागर को मात करती है । जवानी की कल्पनाएं आकाश को भी छोटा साबित कर देती है । युवा वर्ग अपने जातीय संगठन में अनेक प्रकार से योगदान कर सकता है । उसे अपने जाति समाज संगठन का आदर करना चाहिए और अपने जीवन में उसे झलकाना भी चाहिए । अपने जातीय संगठन में एकता की भावना से ओतप्रोत हो कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए । अन्य षडयंत्रों से दूर रह अपने सामाजिक संगठन में योगदान देने आगे आना चाहिए ।
जातीय संगठन एक विशाल परिवार होता है । जो भमिका युवा वर्ग की परिवार में होती है वही संगठन के प्रति भी होनी चाहिए । हर सामाजिक संगठन का भविष्य उसके युवा वर्ग पर निर्भर होता है। अत: युवा वर्ग को इस उत्तरदायित्व वहन कर जहां भी हो वहीं अपने कत्र्तव्य का पालन करना चाहिए। उसे कठपुतली न बनकर अपने जातीय संगठन को विकसित करने के लिए आचरण करना चाहिए । स्वस्थ तन और स्वस्त मन, यही युवा वर्ग की पूंजी है । आज की दूरदर्शन संस्कृति ने युवा वर्ग को अपने माया जाल में इस प्रकार उलझा लिया है कि वह भटकने लगा है । अपनी सामाजिक संस्कृति को भूल कर अन्य विदेशी संस्कृति में रंगने लगा है । जिसका दुष्परिणाम सामने आ रहा है। आज के युवकों को सामाजिक संगठन के हित पर चर्चा करना, समय नष्ट करना प्रतीत होता है। यह शुभ लक्षण नहीं है ।
अजय त्रिपाठी
अध्यक्ष-विप्र वार्ता परिवार

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