हमारी प्रवक्ता हो गई है 'विप्र-वार्ता' पत्रिका

हमारी प्रवक्ता हो गई है 'विप्र-वार्ता' पत्रिका

भारतीय समाज में एक व्यापक बहस छिड़ी है कि अज्ञानता के बंद दरवाजे खोलने के लिए आखिर हमें कैसी पत्र-पत्रिकाएं चाहिए? हमारी च्वॉइस क्या होनी चाहिए? एक तरफ वे प्रकाशन समूह हैं जो पाठकों को सेक्स-सर्वे परोस रहे हैं? और दूसरी ओर विप्र-वार्ता जैसी धार्मिक, सामाजिक हितों को साधती पत्रिकाएं हैं जो समाज और देश में एकता, समरसता और संस्कारयुक्त वातावरण का निर्माण होने में अपना योगदान देना चाहती हैं। जरूरी है कि ऐसी पत्रिकाएं पुष्पित-पल्लवित हों और इसके लिए सम्पूर्ण ब्राम्हण समाज की वैचारिक आहूति जरूरी है।
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अनिल द्विवेदी
हिन्दी पत्रिकाएँ, समाज में वैचारिक क्रांति लाने, एकता व सद््रभाव स्थापित करने में विशिष्ट योगदान देती आई हैं साथ ही हिन्दी भाषा के सम्मान और उसके विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। विचार आईना होते हैं और पत्रिकाएं चेहरा : सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार महाश्वेतादेवी वर्मा के इन विचारों के धरातल में राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका विप्र-वार्ता, खरा उतरती है। ब्राम्हण समाज की एकता, समरसता और उसका कल्याण करने के लक्ष्य के साथ विप्र-वार्ता का प्रकाशन सन् 2006 से हुआ और 2014 में 100 अंकों के प्रकाशन का कीर्तिमान बनाया है। देश के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य प्रभाकर मिश्रा और पं. मांगेराम शर्मा ने अपने आर्शीवचन में ठीक ही कहा था कि आने वाले समय में विप्र-वार्ता पत्रिका छत्तीसगढ़ समाज का आईना साबित होगी।

अलग होने के भी अपने कई निहितार्थ हैं, तहें हैं। छत्तीसगढ़ सर्व युवा ब्राह्मण परिषद के बैनर तले प्रकाशित हो रहे इस विचार-मासिक ने अब तक हजारों पाठकों और परिवारों को अपने से जोड़ा है। ज्यादा नहीं लेकिन 1980 के दशक तक जब मोबाइल, फोन और न्यूज चैनल हमारी जद में नहीं थे तब हमारे मस्तिक को ज्ञान और उर्जा देने का एक माध्यम मैगजीन हुआ करती थीं। पत्रिका के नियमित पाठक श्री श्रीनिवास तिवारी कहते हैं कि कभी कल्याण और गीता प्रेस प्रकाशन जैसी पत्रिकाएंं आपका ज्ञान बढ़ाने, आईना दिखाने और आपके दिमाग में जमा वैचारिक कूड़े करकट को छानने का काम करती थी, अब यही काम विप्र-वार्ता ने भी अपने हाथ में लिया है।

तमाम तरह के जलते हुए प्रश्रों तथा भेदती हुई दृष्टि के साथ सम-सामयिक रचनाओं का प्रकाशन, विप्र-वार्ता को अन्य पत्रिकाओं से अलग पहचान देता है। इसमें आपको सम-सामयिक विषयों पर लेख मिलेंगे तो दूसरी ओर पुरस्कृत और सम्मानित होते, सफलताएं हासिल करने वाले विप्रजनों से साक्षात्कार भी कराती है। कह सकते हैं कि महापुरूषों पर लेख, कविताएं, विशेषांक इत्यादि रचनाओं का यह एक सुंदर गुलदस्ता है। लेखक ने किसी भी अंक में निम्नस्तरीय आलेखों, खुशामदीद या चापलूसी की सीमा तोड़ देने वाली रचनाओं को जगह मिलते नही पाया। विज्ञापन या आर्थिक सहयोग के मजबूरी के चलते कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जाना चाहिए। नई पीढ़ी की रूचि को देखते हुए विप्र वार्ता का ऑनलाइन संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध है. डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट विप्रवार्ता डॉट ओआरजी पर जाकर अपना मेल आईडी दर्ज कराने पर आपको प्रतिअंक के अपडेट मिल सकते हैं साथ ही प्रकाशित अंकों का अवलोकन भी किया जा सकता है।

विप्र-वार्ता ने वैचारिक आंदोलन अनवरत जारी रखने के साथ-साथ ब्राम्हण समुदाय के हितों, उसकी एकता, समस्याओं तथा सम-सामयिक मुद्दों पर आवाज भी बुलंद की है। पदोन्नति में आरक्षण के विरोध में धरना, परशुराम जन्मोत्सव पर महाआरती, परशुराम जन्मोत्सव अंक, विप्र-बन्धु नेटवर्क-वीबीएन का संचालन, तुलसी जयंती पर पिकनिक का आयोजन, राजिम कुम्भ कल्प पर विशेषांक, सदभावना यात्रा विशेषांक यह दर्शाते हैं कि विप्र-वार्ता की टीम ने अपना सामाजिक दायित्व बखूबी निभाया है। समाज में अनुकरणीय योगदान दे रही ब्राम्हण महिलाओं के लिए महिला शिखर सम्मान समारोह का प्रतिवर्ष आयोजन मील का पत्थर साबित हुआ है।

पूंजी और बाजार की विवशता से जूझते हुए तथा उपेक्षा के दंश को सहते हुए विप्र-वार्ता श्वेत-श्याम से कब रंगीन हो गई, पता ही नही चला। इसका पूरा श्रेय संपादकीय-प्रबंधकीय टीम को जाता है। संपादकीय टीम ने इसे वैचारिकता का ठोस धरातल प्रदान किया है। इसके लिए गहरी प्रतिबद्धता और जुनून की जरूरत है। विप्र-वार्ता के संपादक श्री अजय त्रिपाठी ऐसे ही संपादक हैं। आत्मविश्वास से लबरेज श्री त्रिपाठी कहते हैं, संकुचित दृष्टिकोण न अपनाते हुए विप्र-वार्ता सभी ब्राम्हण समुदायों का प्रतिनिधित्व और स्वागत करती प्रतीत होती है। पूरे राज्य में सर्व ब्राम्हण समाजों की कुल आबादी 20 लाख से ज्यादा होगी। इसके बनिस्बत पत्रिका की प्रसार संख्या ऊंट के मुंह में जीरा समान ही है।
वैसे व्यक्तिगत प्रयासों से और विज्ञापन न मिलने के बावजूद पत्रिका निकालना अत्यंत दुष्कर कार्य है। हालांकि इतने गंभीर माहात्मय के बावजूद आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नही है। जैसे-तैसे पत्रिका प्रकाशित हो रही है।

श्री त्रिपाठी थोड़ा शिकायती लहजे में मगर अनुनय के साथ कहते हैं, हमारा आग्रह सिर्फ इतना है कि प्रत्येक ब्राम्हण परिवार विप्र-वार्ता का ग्राहक बन जाए, इतना ही सहयोग काफी होगा। विप्र-वार्ता को इस ऊंचाई तक पहुंचाने में जिन विप्रजनों ने नींव के पत्थर की तरह खुद को समर्पित किया है, उनमें संस्थापक और प्रथम प्रधान संपादक स्व. शैलेन्द्र शर्मा अग्रणी नाम है। इसके अलावा सुरेश शुक्ला, सुप्रभ झा, सतीश शर्मा तथा तरूण चन्सोरिया जैसे विप्रजन शामिल हैं। पत्रिका की संपादकीय और सलाहकार टीम में संपादक अरविन्द ओझा, प्रबंध संपादक- ओमप्रकाश मिश्रा, सुनील तिवारी, धनंजय त्रिपाठी, श्रीमती ममता राय, श्रीमती संगीता शर्मा, अमित शर्मा, आलोक पाण्डेय, हेमंत तिवारी, अनुराग मिश्रा, राजीव चक्रवर्ती, शिवाकांत त्रिपाठी इत्यादि शामिल हैं।

राजधानी के अलावा पूरे प्रदेश में विप्र-वार्ता की सुध लेने वाले कई विप्रजन जुड़े हैं। इनमें मुख्य रूप से पी. भानू जी राव (भिलाई), विमलेश बाजपेयी (बिलासपुर) राजकुमार दुबे, गुणनिधि मिश्रा, मुकेश शर्मा, रामकिशन शर्मा, श्रीमती सुनीता चंसौरिया, विवेक बाजपेयी (रायगढ़), ओम शर्मा (कुनकुरी), सूरज तिवारी (धमतरी), अजयकांत शुक्ला (भाटापारा) जयप्रकाश गौतम (कोरबा) राकेश तिवारी (लोरमी), अनिल शर्मा (सतना), पद्मेश शर्मा (चांपा), सुरेश द्विवेदी (महासमुन्द), फाल्गोप्रसाद त्रिपाठी (मनेन्द्रगढ़), तरूण मिश्रा (कोरबा), वैभव तिवारी (पेण्ड्रा), गणेश तिवारी (कांकेर), अरविन्द तिवारी (चौकी), सुदेश दुबे (बिलासपुर), अनुराधा राव (भिलाई), लता बाजपेयी (गोंदिया), सौरभ कुमार दुबे (साजा), संतोष पाण्डेय (दल्ली), सुशील तिवारी, रायपुर इत्यादि अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय संपादकगणों में डॉ. धर्मसिंग कौशिक (ब्राम्हण अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष), गोविन्द त्रिपाठी क्रांतिकारी (दिल्ली), विनायक शर्मा (मण्डी, हिमाचल प्रदेश), भरत तिवारी (सागर म.प्र.), रजनी जानी (सूरत गुजरात), अजय अत्री (रेवाड़ी, हरियाणा) इत्यादि का मार्गदर्शन मिलता रहा है।

फिलवक्त भारतीय समाज में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि अज्ञानता के बंद दरवाजे खोलने के लिए आखिर हमें कैसी पत्र-पत्रिकाएं चाहिए? हमारी च्वॉइस क्या होनी चाहिए? एक तरफ वे प्रकाशन समूह हैं जो पाठकों को सैक्स-सर्वे परोस रहे हैं? और दूसरी ओर विप्र-वार्ता जैसी धार्मिक व सामाजिक हितों को साधती पत्रिकाएं हैं जो समाज और देश में एकता, समरसता और संस्कारयुक्त वातावरण का निर्माण होने में अपना योगदान देना चाहती हैं। इसके लिए जरूरी है कि पत्रिकाएं जिंदा रहें और इसके लिए सम्पूर्ण ब्राम्हण समाज की वैचारिक आहूति जरूरी है।

अनिल द्विवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
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