विचार गोष्ठी

आदरणीय साथियों , 12 सित को शाम 4 से 7 बजे तक वृब्दावन हाल रायपुर में विप्र वार्ता की उपयोगिता और उसके सांस्कृतिक संरक्चन ,समाज पर पढ़े प्रभाव , भविष्य में रुपरेखा क्या हो, विषय पर विचार गोष्टी पत्रिका के 100 वे अंक में प्रकाशन हेतु आयोजित है आपको सादर आमंत्रण
अजय त्रिपाठी

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विप्र वार्ता पहुची 100 वी पायदान पर

विप्र वार्ता 100 वा अंक सितम्बर में प्रकाशित होने जा रहा है आप सभी सादर आमंत्रित है , सभी से निवेदन की पत्रिका की उपयोगिता और उदेश्शय प्राप्ति की दिशा में बढे कदम और भविष्य में आपकी नजर में पत्रिका के स्वरूप पर अपने विचार शीघ्र आगामी अंक में प्रकाशन हेतु भेजे

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समस्त प्रतिनिधियों के निवेदन

कृपया आगामी परशुराम जयती विशेषांक हेतु अपने क्षेत्र से विप्रो के इस प्रमुख पर्व हेतु शुभकामना विज्ञापन प्राप्त कर प्रेषित करें। सभी सदस्यों की सदस्यता समाप्ति की ओर से कृपया विशेष ध्यान देकर सदस्यता निरंतर करवाने में मदद करें अन्यथा पत्रिका प्रेषित किया जाना संभव नहीं होगा। संपादक

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वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था -जन्म मूलक या कर्म मूलक-- ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरूषसूक्त में शुद्र शब्द आया है इससे इस बात की पुष्टि होती है कि आज से लगभग 1500-1000 ईसा पूर्व अर्थात ऋग्वेदिक काल में वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ था। यह माना जाता है कि इस काल में समाज समतावादी था अर्थात समाज में छूआछूत का प्रचलन न

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घर से हो चरित्र निर्माण

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घर से हो चरित्र निर्माण तब होगा समाज-देश-महान --- भारत में आज भी सामाजिक सुरक्षा का काम परिवार करता है। जिस कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा बोझ नही पड़ता । परिवार केन्द्रित समाज की अर्थव्यवस्था होने के कारण से भारत की घरेलू बचत दर दुनिया में सब से ज्यादा 36 प्रतिशत है। जो भारत को समुचित विकास

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वर्तमान में ब्राह्मण नेतृत्व उसका अस्तित्व

भारतीय संस्कृति राजनीति एवं सामाजिक परिवेश प्रारंभ से ही ऋषिमुनियों एवं ब्राह्मणों से प्रभावित एवं संचालित रही है। प्राचीन काल में राजों महाराजों के सलाहकार एवं राज पुरोहित ब्राह्म वर्ग से ही हुआ करते थे.

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रामचरित मानस और मकर संक्राति

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने मानस में मकर संक्रांति पर होने वाले इस सन्त समागम का इस प्रकार वर्णन किया है । माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मञ्जहि सकल त्रिवेनी।।
पूजहि माधव पद जल जाता, चरिस अरवय बटु हर सहिं गाता।

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मकर संक्रांति : उत्तरायण का पर्व

हमारा देश धर्म और प्रकृति प्रदान है। अत: यहां के हर पर्व प्रकृति से जुड़े होते है। प्रकृति हमारे जीवन में ही नहीं हमारी परंपराओं में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यही कारण है कि हमारे हर त्यौहार ऋतुओं के अनुसार ही आते है। इसी क्रम में मकर संक्रांति का पर्व भी मूलत: प्रकृति से जुड़ा पर्व है । संक्र

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