Festival

पुरूषोत्तम मास 2010

भारतीय मान्यता के अनुसार प्रत्येक तीसरे वर्ष मलमास (पुरूषोत्तम मास) होता है । इस वर्ष वैशाख अदिक मास है । जिस माम में शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से अमावश्या पर्यन्त संक्रान्ति नहीं होती है वह अधिकमास कहलाता है । चन्द्रमासोध्यसंकान्तो मलमास: प्रकीर्तित: । रविणालंधितोमासश्चांद्र: ख्यातो मलिम्लुच: । पुराणों में इसे चन्द्रमासों की अपेक्षा अधिक महत्व दिया गया है । इस मास के स्वामी भगवान नारायण है । अत: इसे पुरूषोत्तम मास कहा गया है । पुरूषोत्तम मास में अनित्यकर्म, देवप्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत, विवाह, चौलादि, गृहांरंभ आश्रमों का स्वीकार, व्रतांरंभ, प्रायश्चित, सर्पबलि, अ्र्टका श्राद्ध विष्णु शयन, दुर्गा इन्द्र की स्थापना, तीर्थयात्रा, ध्वजारोहण, इत्यादि कृत्य करना वर्जित है ।

अधिकमास के कार्य- नित्य कर्म, संध्योपासना, नैमित्तिक कर्म, पुंसवन सीमंत, जातककर्मादि से अनॅनप्रासन्न तक सभी संस्कार, द्वादशाह, सपिण्डांत कर्म, नित्याग्नि होम, अतिथि पूजन आदि कर्म करना चाहिए । पुरूषोत्तम मास में पुरूषोत्तम मास माहत्मय. कथा, पुराणों के श्रवण करने का विशेष महत्व होता है । इस मास में प्रात: स्नान दीपदान, गौ सेवा, ब्राह्मïण भोजन, अभिषेक आदि सत्कार्यों के करने का महत्व बताया गया है । पुराणों में बताया गया है कि अन्य मासों में किये गये सत्कार्यों का फल प्राप्त होता है । किन्तु वह अक्षय नहीं होता अर्थात सत्कार्यों का फल भोगकर पुन: मृत्यु लोक में आना पड़ता है । छिन्ने पुण्ये मृत्युलोके पतन्ति । जबकि पुरूषोत्तम मास में किये गये सत्कार्यों का अक्षय फल प्राप्त होता है । जिससे व्यक्ति को भगवान नारायम की प्राप्ति होती है । प्रात: पुरूषूक्त से भगवान विष्णु का अभिषेक पूजन, तुलसीदल अर्पण से समस्त पाप नष्टï हो जाते हैं ।

पं. राजलोचन दीक्षित डोंगरगांव

जयकारे के साथ निकली रामजी की सवारी

हथबंद । न्यू छत्तीसढ़ स्कूल में रामनवमी पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया । भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें शाला के छात्र छात्राएं श्रीराम के विभिन्न रूप धरे हुए थे । श्रीराम के जयकारे के बीच लोगों ने शोभायात्रा झांकी का आरती उतारकर स्वागत किया ।

शोभायात्रा में भय प्रकट कृपाला, श्री रामचंद्र कृपालु भजमन के भजन व शंखनाद गूंज रहे थे । शोभायात्रा में सरपंच आनंद यादव, उपसरपंच अशोक दुबे, ने स्वागत कर बच्चों को फल बांटे तथा शीतल पेय वितरित किया । मुस्लिम समाज के अध्यक्ष मुबारक हुसैन व मदरसा अंजुमन इस्लामिया की संचालिका वहीदा बेगम ने झांकी की आरती उतारी तथा श्रीफल भेंटकर श्रीराम बने बच्चों को तिलक लगाया ।

बिजूरी । अनुपपुर (म.प्र.) सर्व ब्राह्मïण समाज बिजूरी में भघवान श्रीराम चंद्र जी के जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया गया । इस अवसर में श्री राम जी की आरती, श्री हनुमान चालीसा का भव्यपाठ एवं विशेषत: सुन्दरकाण्ड का आयोजन किया गया । जिसमें अंचल के सुविख्यात गायक आनंद जी एवंउनके सहयोगियों ने स्वर दिया । इस अवसर पर कोयलांचल के पदाधिकारी एवं भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, गौसेवा के पदाधिकारी एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों की विशेष उपस्थिति रही ।

इस कार्यक्रम में बलराम त्रिपाठी, राम कुमार पाण्डेय, हरिशंकर तिवारी, बी. मिश्रा, श्रीराम गौतम, अखिले्श जी, जमुना प्रसाद, आनंद कुमार, आदि उपस्थित रहे ।  read more »

Dhananjay Tripathi's picture

विभिन्न शहरों में होली मिलन सम्पन्न

होली का पर्व हिन्दू समाज सहित ब्राह्मïणों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है । होली मिलन के सार्वजनिक कार्यक्रम विभिन्न शहरों में अलग अलग तरह से हर्षोल्लास के साथ मनाये गये । रायपुर राजधानी में भी छत्तीसगढ़ी ब्राह्मïण समाज महिला मंडल सरयूपारीण ब्राह्मïण समाज, कान्यकुब्ज ब्राह्मïण समाज, गौण ब्राह्मïण समाज, साकद्विपीय ब्राह्मïण समाज, सनाढ्य ब्राह्मïण समाज, नर्मदीय ब्राह्मïण समाज सहित सामाजिक संगठनों ने अलग अलग अंदाज में होली मिलन की कार्यक्रम आयोजित किये ।

आशीर्वाद भवन में हुआ होली मिलन

कान्यकुब्ज ब्राह्मïण समाज द्वारा होली मिलन का कार्यक्रम आशीर्वाद भवन बैरन बाजार में आयोजित हुआ जिसमें संस्था के सचिव राजेन्द्र शुक्ला को मूर्ख कान्यकुब्ज ब्राह्मïण शिरोमणी की उपाधि से विशेष रूप से निर्मित टोपी पहनाकर सम्मान किया गया एवं फल फूलों व सब्जियों के निर्मित माला पहनाई गई । इस अवसर पर अध्यक्ष श्री वीरेन्द्र पाण्डेय उपस्थित थे । कार्यक्रम का संचालन कार्यकारिणी सदस्य श्री हेमंत तिवारी ने किया ।

श्री राजेन्द्र शुक्ल ने अपने सम्मान को समस्त समाज के बुजुर्गों एवं युवाओं को समर्पित करते हुए भविष्य में उनसे सहयोग एवं स्नेह की आशा की । अंबागढ़ चौकी से पधारी कान्यकुब्ज ब्राह्मïण समाज की टीम ने इस अवसर पर परम्परागत फाग का गायन किया । इस मंडली का नेतृत्व वयोवृद्ध नेता नवनिर्वाचित नगर पालिका अध्यक्ष श्री धुन्नु महाराज त्रिपाठी जी ने किया । जिनका सम्मान भी इस अवसर समाज की ओर से किया गया ।

बच्चों एवं महिलाओं की आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण भी किये गये। बड़ी संख्या में समाज के महिला, पुरूष बुजुर्ग शामिल हुए । सभी ने उत्तम व्यवस्था में भोजन आदि ग्रहण किया। एवं कार्यक्रम की भूरि भूरि प्रशंसा की । इस कार्यक्रम का विशेष आकर्षण अपने अविस्मरणीय क्षणों को याद करना रहा । कार्यक्रम में श्री गौरीशंकर शुक्ला, शरद शुक्ला, विपिन बिहारी त्रिवेदी, राजेन्द्र शुक्ला, अरूण शुक्ला, राजेश दीक्षित, ज्ञानेश त्रिपाठी, संजय अवस्थी, रविन्द्र शुक्ला, डॉ.दिनेश मिश्रा, शिखा त्रिवेदी, ममता शुक्ला, नीलिमा शुक्ला, रंजना त्रिपाठी, संध्या मिश्रा सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे ।

ब्राह्मïण समाज का होली मिलन समारोह

कवर्धा । जिला ब्राह्मïण समाज के तत्वावधान में होलीमिलन समारोह का आयोजन किया गया । होली मिलन समारोह में नगर स्तरीय फाग गीत प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमें अन्य समाज के विभिन्न मंडलियों ने बड़े उत्साह से भाग लिया। अश्विनी पाण्डेय ने अपने चुटिले अंदाज में उपस्थितजनों को होली की शुभकामनाओं के साथ हास्यविनोद प्रस्तुत किया ।

फाग प्रतियोगिता में प्रथम स्थान दंतेश्वरी प्रभात फेरी मंडली को मिला। द्वितीय स्थान श्रीराम सेवक मानस मंडली और तृतीय स्थान, श्री तुलसी मानस मंडली को मिला । सभी विजेताओं को मुख्य अतिथि शकुनतला शर्मा एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष टी.आर. तिवारी द्वारा शील्ड एवं गीता रामायण ग्रंथ प्रदान कर सम्मानित किया गया । जिला ब्राह्मïण समाज के अध्यक्ष लालजी मिश्रा ने होली की शुभकामनाओं के साथ 21 मार्च को वृहद ब्राह्मïण सम्मेलन की जानकारी दिए ।

होली

होली

जो भक्त परब्रह्मा परमात्मा में दृढ़ निष्ठावान है, उनके आगे प्रकृति अपना नियम बदल लेती है, अग्नि उन्हें जला नहीं सकती , पानी उन्हें डूबा नहीं सकता, हिंसक पशु उसके मित्र बन जाते हैं । समस्त प्रकृति उसकी दासी बन जाती है , उसके अनुकूल बन जाती है इसी को याद दिलाने के लिए यह होली का पवित्र दिन है ।

हिन्दू सम्वत के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व होली वर्ष का अंतिम त्यौहार है । यह एक ऐसा पर्व है जिसमें प्रकृति का एक अद्भुत सौन्दर्य चारो ओर दिखाई देता है । वैदिक काल में यज्ञ के रूप में मनाये जाने वाले पर्व होलिका दहन में समय के साथ अनेक घटनाएं जुड़ती चली गयी । नारद पुराण के अनुसार यह पवित्र दिन भक्त प्रहलाद के विजय और हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के विनाश की स्मृति का दिन है ।

मानव समाज के हित को ध्यान मे ंरखते हुए हमारे देश के अन्य पर्वों की भांति होलीके पीछे भी ऋषि मुनियों का एक विशेष दृष्टिïकोण रहा है । होली मनाने की परम्परा का

मानव स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता हरहा है । देश भर में एक रात मेंसम्पन्न होने वाला होलिका दहन, शीत और ग्रीष्म ऋतु की संधि का विशेष संधि काल है जिससे इस ऋतु में होने वाली अनेक बीमारियां जैसे खसरा, मलेरिया आदि से रक्षा होती है वहीं दूसरी ओर जगह जगह पर प्रजनलित महाअग्नि की प्रदीप्त ज्वालाएं आवश्यकता से अधिक ताप उत्पन्न कर समस्त वायुमंडल को उष्ण बनाकर जहां एक ओर रोग के कीटाणुओं का संहार कर देती है वहीं दूसरी ओर प्रदक्षिणा के बहाने अग्नि की परिक्रमा करने से शरीरस्थ रोग के कीटाणु भी नष्टï होते हैं ।

होली के दिन किया जाने वाला गाना बजाना, दौड़ना, भागना, आदि ऐसी शारीरिक क्रियाएं हैं जिनसे कफ प्रदीप शांत हो जाता है और सहसा कफ जन्य कोई बीमारी नहीं होती है ।
होली रंगों का त्यौहार है इस पर्व पर जिस रंग के प्रयोग का विधान शास्त्रकारों न किया है वह है पलाश, अर्थात ढाक के फूलों, टेसुओं का रंग हिन्दू संस्कृति में ढाक एक पुनीत वृक्ष माना जाता है , ब्रह्मïचारी को उपनयन के समय ढाक का ही दंड धारम करवाया जाता है एवं सर्व साधारण के लिे यज्ञार्थ समिधा भी ढाक की ही बतलायी गयी है ।

पलाश के फूलों से तैयार किया गया रंग एक प्रकार से उसके फूलों का अर्क होता है, उस रंग में भीगा हुआ कपड़ा शरीर पर डाल दिया जाये तो रंग शरीर के रोमकूपों के द्वारा आभ्यान्तरिक स्नायुमंडल पर अपना प्रभाव डालता है और संद्रायक बीमारियों को शरीर के पास फटकने तक नहीं देता ।

गुलाल, अबीर भी ऐसी ही पवित्र वस्तुओं में से है । प्राचीन भारत की होली में पलाश के पुष्पों का रंग, गुलाब, अबीर और चंदन का ही प्रयोग किया जाता था । वर्तमान में रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जाने लगा है, जो श्वास और रोमकूपों के द्वारा शरीर को हानि पहुंचाते हैं ।

होली एक पर्व ही नहीं संगीत की एक विद्या भी है, लोक संगीत के साथ साथ होली को शास्त्रीय या उप शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद, धमार, ठुमरी या नौती के रूप में भी गाया जाता है ।

विश्व के इतिहास में 21 मार्च 2008 एक ऐसा दिन था जब हिन्दूओं को होली, ईसाइयों का गुड़ फ्राइडे मुसलमानों का ईद ए मिलाद पारसियों का नवरोज और यहुदियों का पर्व प्यूरिम एकही दिन मनाएं गये ।

डॉ. इति चतुर्वेदी,अंबिकापुर

हमारा प्रमुख त्यौहार होली

हमारे हिन्दू समाज में चार प्रमुख त्यौहार मनाये जाते हैं । दीपावली, दशहरा, रक्षा बंधन एवं होली होली का नामकरम भक्त प्रहलाद की बुआ तथ ाराजा हिरम्यकश्यप की बहिन होलिका के कारम हुआ । होलिकोत्सव त्यौहार मनाने के लिे निम्रलिखित पौराणिक गाथा है । हिरण्यकश्यप को इतना अभिमान हो गया था कि वह स्वयं को भगवान मानने लगा था तथा सब उसे भगवान मानकर पूजने लगे थे किन्तु उनका पुत्र भक्त प्रहलाद बचपन से ही विष्णु की पूजा आराधना करते थे । उन्हें कईप्रकार से समझाया गया किन्तु भक्त प्रहलाद ने अपने पिता को भगवान नहीं माना । पिता द्वारा उन्हें कई प्रकार से यातनाएं दी जाने लगी , अन्त में बहिन ने भाई हिरण्य कश्यप को अपनी शक्ति के बारे में बताया तथा दोनो ंने निश्चय किया कि ये तो मानेगा नहीं अत: उसे मारने की योजना बनाई गई। हिरण्य कश्यप की बहिन ने तप करके एक वस्त्र पाया था जो अग्नि में भी जलता नहीं था । होलिका वह वस्त्र ओढ़कर प्रहलाद को गोद में लेकर लकडिय़ों के ढेर पर बैठ गई। उस ढेर में अग्नि लगा दी गई । राजा हिरण्य कश्यप और उसकी बहन के मन में था कि तपस्या से प्राप्त वरदान के कारम होलिका तो बच जायेगी और प्रहलाद अग्नि में जचल जाएगा । किन्तु भगवान विष्णु की लीला से होलिका का वह वस्त्र हवा में उड़ गया और वह वस्त्र उड़कर प्रहलाद पर गिर गया था । इस कारम बहन होलिका तो भस्म हो गई किन्तु प्रहलाद उस अग्निकाण्ड से बच गये ।

भगवान विष्णु की कृपा से भक्त प्रहलाद को मिले इस जीवन दान के कारण ही होली मनाई जाने लगी ।

होलिका दहन - फाल्गुन पूर्णिमा का रात्रि को होलिका का दहन किया जाता है । दहन के पूर्व महिलाएं होली की पूजा करती है । होली की पवित्र अग्नि घर में लाई जाती है । तब धान्य गेहूं की बालियां होली की पवित्र अग्नि में सेक कर प्रसाद रूप में ली जाती हैा । होली के दूसरे दिन धुलेंडी पर्व मनाया जाता है , समाज के लोग एक दूसरे से मिलकर गुलाल लगा कर होली खेलते हैं । होली के पांचवे दिन रंग पंचमी मनाई जाती है । कई संगठनो ंके जुलूस रंग खेलते हुए निकलते हैं, जिन्हें गेर कहा जाता है । पूरा शहर होली के रंग मे ंडूब जाता है ।

ब्रज की होली - होलिकोत्सव पूर्व में नृसिंह अवतार के समय की घटना है । इस उत्सव को कृष्ण वतार के समय अत्यधिक मधुर और श्रृंगारिक स्वरूप मिल गया । होली के गीतों में बताया गया है कि जीवन बहुत छोटा है अपने ईष्टï देव से मिलने के लिये ध्यान व भक्ति द्वारा उन तक पहुंचकर उनके साथ होली खेलने जैसा आनंद मनाना चाहिए , ईष्टïदेव के इस मिलन में अनहृद की ऊंकार सुनाई देती है जो बिना करताल बजाये ही आती है ।

श्रीमती शारदा मिश्रा

गुरूवार व्रत महात्म्‍य

जिस प्रकार इस धरती पर सभी नदियों मे ंगंगा नदी सबसे अधिक पूर्ण फल प्रदान करने वाली पवित्र नदी है, जिसकी तुलना अनय् नदी से की ही नहीं जा सकती इसी प्रकार हिन्दु धर्म में वर्णित सभी व्रतों में गुरूवार व्रत का महात्म पुण्य समस्त व्रतों से अधिक भौतिक एवं आध्यात्मक के क्षेत्र का फल प्रदान करने वाला है। गुरूवार व्रत की तुलना किसी अन्य व्रत से की ही नहीं जा सकती मानव जीवन के लिए यह पारसमणि के समान है ।

हिन्दू धर्म में जहाँ तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की मान्यता है तथा अलग- अलग समुदाय, सम्प्रदाय द्वारा जहाँ अलग अलग देवी देवताओं की पूजा, अर्चना, उपासना आदि काल से होती चली आई है वहीं समय समय पर अलग अलग व्रत, उपवासों का क्रम प्रचलन में रहा है । मगर हर काल, में जिन व्रत का महत्व ऋषियों, मुनियों ने सबसे अधिक बताया है वह है गुरूवार को । गुरूवार को बीरवार व ब्रहस्पतिवार के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है ।  read more »

Saras Salil

होली फिर आई है, हर साल आती है । आम के पेड़ों में बौर लग गए हैं । मौसम रंग बदल रहा है । गुनगुनी धूप के साथ सर्द हवाओं की सरगोशी अपने शबाब पर है । धूल, अंधड़ के साथ एक अलमस्त बयार । चहुंओर मौज का आलम ।

होली है क्या ? सिर्फ एक त्यौहार ? नहीं, यह त्योहार भर नहीं, उस से कहीं ज्यादा ! इसमें जीवन के बहुतेरे रंग शामिल हैं । हंसी-खुशी, राग-विराग, अच्छाई-बुराई, रिश्ते-नाते, अपनापा, दूरियाँ-नजदीकियाँ। और बेलगाम मौज-मस्ती ।

कुछ-कुछ ब्राजीली कार्निवाल की तरह, सांबा के नाच की तरह । पर इसे ब्राजीलियों की तरह खुले दिल से क्यों नहीं लेते ? क्यों अच्छाइयों के साथ-साथ बुराइयां भी बटोरने लगते हैं ? इस पर चर्चा कहीं और पहले तो यही कि महोली में ऐसा क्यों होता है, दूसरे त्योहारों में ऐसा क्यों नहीं होता कि मौसम के साथ-साथ मन भी बौरा जाए ?  read more »

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माघ - मड़ई मेंलों का महीना

उत्सवधर्मिता हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है । छत्तीसगढ़ की संस्कृति में मड़ई मेलों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है । यहां पर स्थानीय जनभावना के अनुरुप मेलों-मंड़ईयों का आयोजन होता है ।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति विविध रंगों से रंगी हुई हैं वह लोक जीवन की अनगढ़ शैली में कल-कल, छल-छल निनाद करती हुई बहती है । मड़ई शब्द सुनते ही एक ऐसा दृश्य आंखों के सामने आता है, जिसमें गायन वादन के साथ घुंघरुओं की आवाज, तेज पदचाप, विविध ग्राम देवताओं के प्रतीकात्मक झंडे, जो झालरों की तरह बांस के उपरी भाग में बंधे होते हैं, सब कुछ समाहित होता है ।

तरह-तरह की श्रृंगार की वस्तुएं जैसे चूड़ीपाट, फंदड़ा, रंगी-बिरंगी टिकुली, झाबा, कान, हाथ और पैर के आभूषण, चटख रंगो वाली साड़ियां, गमछे, रंगीन कुर्ते, बैलों का घांघरा, बर्तन-माड़ा, साग-भाजी, मिट्टी के बने खिलौने, बांस की टोकनियां और मस्ती में झूमते युवक-युवतियां वृध्द और चकित बालवृंद सब यहीं मिल जाते हैं । राउत नाचा से लेकर सारे ग्रामीण खेल जैसे गुल्ली डंडा, फुगड़ी, खो-खो और भौंरा-बांटी आदि सब आंखों के सामने तैरने लगते है ।  read more »

Ajay Tripathi's picture

दशहरा, विजय दशमी विजय का पर्व

श्रीरामचन्द्र की विजय का पर्व विजयादशमी आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दसमी तिथि पर मनाया जाता है । इसे दशहरा भी कहा जाता है । इस पर्व को भगवती के विजया नाम पर विजयादशमी भी कहा जाता है । इस दिन भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की थी । इस स्वरूप में इस विजयादशमी कहते हैं ।

यह काल तारा उदय होने के कारण विजयकाल होता जिस समय सर्व सिध्दि दायक काल बनता है । इसलिए विजया दशमी भी कहा जाता है । भगवान राम ने शक्ति की उपासना की है और भगवान शंकर की भी, ये दोनों देव शक्ति की परिचायक है । हर शक्ति इनके आगे नि:स्तेज है । भगवान राम अवतार लेते हैं और शक्ति का नाम लेकर रावण का संहार करते हैं इसलिए इनके साथ माता का पर्व भी जुड़ा हुआ है ।

शारदीय नवरात्र में चैत्र की रामनवमी में भगवान राम शक्ति से जुड़े प्रतीत होते हैं देवी ने हर युग और काल में अपने को अजन्मा सिध्द किया है । सीता देवी का जन्म नहीं हुआ, उनका प्राकटय हुआ । श्रीकृष्ण की राधा बनकर रास मंडल में विराजित देवी भी अजन्मा स्वरूप है । देवताओं ने अपनी शक्ति से इनको सुसज्जित किया है । देवी ने असुरों का संहार करके उनके मनोरथ पूर्ण किये । देवी भगवती तो महानिशा महामाया है ।  read more »

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