लगभग तीन माह तक चलने वाले महाकुंभ के दौरान कभी भी स्नान करना पुण्यदायी है, लेकिन कुछ तिथियो ंपर स्नान करना विशेष रूप से पुण्यकारी है । येतिथियां है 20 जनवरी बसंत पंचमी, 30 जनवरी माघ पूर्णिमा, 12 फरवरी महाशिवरात्रि, 15 मार्च सोमवती अमावश्यता, 16 मार्च नव संवत्सर प्रारंभ, 24 मार्च रामनवमी, 30 मार्च चैत्र पूर्णिमा, 14 अप्रैल बैसाखी, और 28 अप्रैल बैसाख पूर्णिमा ।
महाकुंभ मेले का मुख्य आकर्षण शाही स्नान होता है । जब हजारों लाखों की संख्या में साधु संतों की टोली एक साथ पवित्र नदी में स्नान के लिए निकलती है । इस स्नान में अठारह अखाड़ों के साधु एकत्रित होते हैं । तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा, पंचदशनाम जूना अखाडा, उदासीन पंचायती अखाड़ा, निर्मल पंचायती अखाड़ा, पंचायती अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, निर्वाणी अखाड़ा, दिगंबर अखाड़ा, पंच अटल अखाड़ा, महानिर्वाणी पंचायत अखाड़ा, आह्वहान अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा आदि अखाड़ों के साधुीओं का प्रतिनिधित्व वैष्णी अखाड़ा करता है । शाही स्नान के पश्चात ही इन अखाड़ों की भव्य झांकी आयोजित की जाती है, जिसमें साधुओं की शोभायात्रा को देखने केलिए भारी संख्या में श्रध्दालु जुटते हैं ।
हरिद्वार में कुंभ मेले का योग कुंभ राशि में बृहस्पति ग्रह की उपस्थिति पर निर्भर करता है । जब सूर्य मेष राशि में विचरण करे और उसी दौरान बृहस्पति कुंभ राशि में आ जाए तो ऐसे दुर्लभ संयोग पर ही हरिद्वार में गंगा स्नान की परंपरा है । बृहस्पति ग्रह प्रत्येक राशि में लगभग एक वर्षतक विचरण करता है, इसलिए दोबारा कुंभ राशि तक पहुंचने में बृहस्पति को बारह वर्ष लग जाते हैं , तभी महाकुंभ मेले का आयोजन होता है । कहने का अर्थ है कि सूर्य, चंद्र और बृहस्पति की राशिगत स्थितियों के आधार पर ही कुंभ मेले की तिथि का पुर्वानुमान लगा लिया जाता है ।
कुंभ मेले के आयोजन से जुड़ी मान्यताओं के संदर्भ में रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, दुर्वासा ऋषि के श्राप से मुक्त होने और स्वयं को पुन: शक्तिशाली बनाने के लिए इंद्र और सभी देवताओं को अमृत की आवश्यकता हुई । इसके लिए उन्होंने दानवों को समुद्र मंथन के लिए राजी कर लिया । मंथन से उत्पन्न विभिन्न रत्नों के बाद जब अमृत भरा कुंभ निकला, तो देवताओं और दानवों में इसे प्राप्त करने के लिए युध्द हुआ ।इस छीना झपटी में कुंभ से अमृत छलककर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में गिरा। तभी से इन स्थानों को पवित्र मानकर यहां स्थित पावन नदियों के तट पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाने लगा ।
भारतीय उपमहाद्वीप में मनाए जाने वाले अनेक पर्वों में से महाकुंभ अपनी तरह का अकेला और विशिष्ट आस्था से जुड़ा स्नान पर्व है । इस अवसर पर हजारों की संख्या में स्त्री- पुरूष संयासी (साधु) अपने शरीर पर राख लगाए हुए मेले में सम्मिलित होते हैं । इसके साथ ही धार्मिक गोष्ठियों, सामूहिक भजन - कीर्तन का भी आयोजन व्यापक स्तर पर किया जाता है । read more »
21 वीं सदी का पहला महाकुंभ मेला विगत मकर संक्रांति से हरिद्वार मे ंपतित पावनी गंगा के तट पर शुरू हो गया है । श्रध्दालुओं के मन में इसके प्रति कितनी गहरी आस्था है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मेले के पहले ही दिन दस लाख से अधिक लोगों ने गंगा में स्नान किया । यह महाकुंभ प्रत्येक बारह वर्षके बाद देश के चार तीर्थ स्थलों पर क्रमिक रूप से आयोजित होता है । ये तीर्थ स्थल है - गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम तट प्रयाग (इलाहाबाद), गंगा नदी के किनारे स्थित हरिद्वार, शिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन और गोदावरी नदी के तट पर स्थित नासिक। हालांकि प्रत्येक छह वर्ष के अतंराल पर हरिद्वार और प्रयाग में अर्ध्दकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है, लेकिन बारह वर्ष के पश्चात आयोजित किए जाने वाले पूर्ण कुंभ का विशेष महत्व है । हिन्दू आस्ता से जुड़े इस मेले में आन ेवाले लाखों करोड़ों श्रध्दालु विभिन्न शुभ तिथियों पर पवित्र स्नान करते हैं । मकर संक्रांति से आरंभ हुआ यह मेला, इस वर्ष 28 अप्रैल बैसाख पूर्णिमा को आयोजित होने वाले विशेष स्नान के बाद संपन्न होगा । इस दौरान मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी, माघ पूर्णिमा, महाशिवरात्रि, सोमवती अमावस्या, नवसंवत्सर, रामनवमी चैत्र पूर्णिमा और मेष संक्रांति तिथियों पर भी विशेष स्नान किया जाएगा ।
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