इस वर्ष श्रावण मास का आरंभ 27 जुलाई मंगलवार से आरंभ होकर 24 अगस्त मंगलवार को रक्षा बंधन के दिनतक है ,इस बार श्रावण में कुल पांच मंगलवार का संयोग बना है। इसके तुरंत बाद हालांकि सोमवार को श्रावण प्रतिपदा तिथि आरंभ हो जाएगी लेकिन 27 जुलाई को भी सूर्योदय के समय तक प्रतिपदा तिथि रहने से चन्द्रमास श्रावण का आरंभ मंगलवार से ही माना जाएगा। ज्योतिषियों का कहना है कि यदि मंगलवार को प्रतिपदा शून्य-क्षय रही होती तो वह पूर्णिमा के साथ चन्द्रमास आरंभ की स्थित शास्त्रों में श्रावण मास के दौरान पांच मंगलवार के संयोग पर कहा गया है कि रक्तेन पूरीता पृथ्वी, छत्र भंग स्वैदा भवैत.. अर्थात यह संयोग राजाओं में मतभेद एवं मंत्रीमंडल में परिवर्तन लाता है। read more »
भारत भर में चातुर्मास व्रत प्रांरभ हो रहे हैं। वर्षा के चार माह एक ही स्थान पर रहकर साधना करना सभी संतों के चातुर्मास में शामिल होना होता है। इस वर्ष का चातुर्मास व्रत 25 जुलाई, गुरु पूर्णिमा के साथ इस व्रत का शुभारंभ होगा।चातुर्मास देवशयनी एकादशी 21 जुलाई से प्रारंभ होगा और समापन देवउठनी ग्यारस से होगा। इस दौरान एक स्थान पर रहकर बह्मचर्य का पालन किया जाता है। चार माह संत जमीन पर सोते हैं और रसदार पदार्थ भी त्याग देते हैं। चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु की आराधना करें तो सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसके अलावा गुरुवार को उपवास और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया जाना भी लाभप्रद होता है। read more »
वृंदावन मथुरा के यमुना पार स्थित जहांगीरपुरग्राम,डांगौली, मांट का बेलवन लक्ष्मी देवी की तपस्थली है। यहां लक्ष्मी माता का अत्यंत सिद्ध भव्य मंदिर है।यहाँ पौषमाह में लक्ष्मी माता की जय- जयकार सुनाई देती है। हर वर्ष असंख्य श्रद्धालु यहां अपनी सुख-समृद्धि के लिए मनोकामना करने आते हैं। यहां पौषमाह के प्रत्येक गुरुवार को विशाल मेला भरता है। प्राचीन काल में इस स्थान पर बेल के वृक्षों की भरमार थी इस लिए इस स्थान को बेलवन कहते है भगवन श्री कृष्ण-बलराम यहां अपने सखाओं के साथ गायें चराने आया करते थे। श्रीमद्भागवत में इस स्थान की महत्ता का वृहद् वर्णन है। भगवान् श्री कृष्ण ने जब सोलह हजार एक सौ आठ गोपिकाओं के साथ दिव्य महारासलीला की तब माता लक्ष्मी देवी के हृदय में भी इस लीला के दर्शन करने की इच्छा हुई और वह बेलवनजा पहुंची, परंतु उसमें गोपिकाओं के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था। read more »
भारत में हिन्दुयो का सबसे बड़ा त्यौहार भगवन जगन्नाथ की रथ यात्रा हिन्हू बड़ी श्रीद्धा से मानते है , भगवन की रथ यात्रा का पर्व काल चालू हो चूका है एस समय भवन ज्वर से पीड़ित हो आराम कर रहे है उन्हें भोग में जड़ी -बूटी खिलाई जा रही है पूरी के रजा के नेत्रित्व में रथ यात्रा अषाढ़ की दुतिया को प्रारभ होगी भगवन अपनी मोसी के घर रथ पर जायेगे देखे पूरी में रथ यात्रा का विडिओ भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विडिओ read more »
भारत में हिन्दुयो का सबसे बड़ा त्यौहार रक्षा बंधन को पाकिस्तान में रहने वाले हिन्हू भाई भी बड़ी श्रीद्धा से मानते है ,भाई -बहन के पवित्र रिश्ते को बताता बढाता यह रक्षा बंधन विडिओ देखे ,पाकिस्तान में रक्षाबंधन विडिओ read more »
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हमारे यहां चार धाम प्रतिष्ठित हैं। ये हैं- बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम्और जगन्नाथपुरी।
जगन्नाथपुरीमें भगवान जगन्नाथ की पूजा होती है। भगवान जगन्नाथ को दारुब्रह्मव काष्ठब्रह्मभी कहा जाता है। भगवान का यह विग्रह दारु अथवा काष्ठ से बनाया जाता है। जिस वर्ष दो आषाढ पडते हैं, भगवान का पुराना काष्ठ-कलेवर बदल कर नव काष्ठ-कलेवर में प्राण-प्रतिष्ठा करके उन्हें रत्नवेदीपर प्रतिष्ठित कर दिया जाता है। वर्ष में दो आषाढ कम-से-कम आठ और अधिक से अधिक उन्नीस वर्ष में पडते हैं। नव-कलेवर का निर्माण चैत्र शुक्ल दशमी को प्रारम्भ होता है। विश्वकर्मा मंडप में निंबकाष्ठसे भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा के विग्रहोंका निर्माण होता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी पुरी में भगवान जगन्नाथ के रूप में विद्यमान हैं। उनके साथ अग्रज बलराम और अग्रजा सुभद्रा यहां त्रिमूर्ति के रूप में विराजित हैं।
भगवान जगन्नाथ के रथ का निर्माण लकडी से होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नन्दिघोष है। इसे चक्रध्वज,गरुडध्वजऔर कपिध्वजभी कहते हैं। इसमें जुते घोडों के नाम शंख, बलाहक,श्वेत एवं हरिदाश्वहैं। रथ के सभी घोडे श्वेत वर्ण के होते हैं। इस रथ के रक्षक नृसिंह भगवान हैं। बलराम के रथ का नाम तालध्वजहै। इसे बहलध्वजभी कहते हैं। रथ के सभी घोडे कृष्ण वर्ण के होते हैं और उनके नाम तीव्र, घोर, दीर्घाश्रमएवं सुवर्णनाभहैं। रथ के रक्षक वासुदेव हैं। सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलनहै। इसे पद्मध्वजभी कहा जाता है। इसकी घोडिया भूरा रंग की होती हैं और उनके नाम रोचिका,मोचिका,जिता एवं अपराजिता है। रथ की रक्षिकाजयदुर्गाहैं। read more »
भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन मध्याह्नकालमें अनन्त भगवान की पूजा करके चौदह गांठ वाले अनंतसूत्रको विधिवत धारण करने से समस्त संकट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि प्राप्त होती है, ऐसी मान्यता है। अनन्तचतुर्दशीके व्रत में बिना नमक का फीका भोज्य पदार्थ भोग लगाकर प्रसाद-स्वरूप ग्रहण किया जाता है।
अनंतसूत्र बांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को भोग में पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करना चाहिए । पूजा के बाद व्रत-कथा को पड़ना या सुनना चाहिए ।
इस कथा में यह कहानी है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से किया। कौण्डिन्यमुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्तसूत्रबांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। read more »
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या पर मनाई जाने वाली शनि जयंती इस बार शनिवार को ही है । यह शनैश्चर जयंती का संयोग चार साल बाद बना है। शनि की जयंती 12 जून को है। इस दिन सर्वार्थसिद्धि अमृतयोग भी बन रहा है।शनि के दुष्प्रभावों को दूर करने के उपाय: करने में आज दिन विशेष महत्त्व का है 2003 और उसके बाद 2006 में शनिवार को शनि जयंती आई थी। इस साल के बाद अगला योग सन् 2013 में बनेगा। इस बार कन्या व तुला राशि पर साढ़े साती तो मिथुन और कुंभ राशि पर अढैया चल रही है। इन राशि वालों को शनि महाराज का पूजन कर तेल से अभिषेक करना चाहिए। शनि साधकों के लिए भी यह विशेष दिन है। इस दिन पूजा-अभिषेक करने से शनि महाराज की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शनि जयंती पर हनुमानजी की आराधना और पीपल-बरगद के पूजन का भी खास महत्व है। read more »
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