रायपुर । श्रावण मास की पूर्णिमा पर बुधवार को प्रात: महादे घाट स्थित खारून नदी में विप्र ब्राह्मणों ने सामूहिक रूप से वैदिक स्नान किया । इस प्रसंग पर संस्कृत महाविद्यालय वेद विभाग के प्राध्यापक डॉ. read more »
उत्तरप्रदेशीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (आगरा) द्वारा वृध्दजन एवं मेघानी छात्र सम्मान समारोह माथुर वैश्य सभा भवन में संपन्न हुआ । समारोह का उद्धाटन डॉ. चन्दन लाल पाराशर पीयूष ने दीप प्रज्जवलित कर किया गया ।
जिसमे ंमुख्य अतिथि ब्राह्मण समाज आएॅफ इंडिया के अध्यक्ष पं. आर.डी. दीक्षित जी मुख्य वक्ता अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री पं. महेश कुमार मिश्रा एवं श्याम संदेश के सम्पादक पं. राधेश्याम दुबे तथा विशिष्ट अतिथि पं. शिव सहाय मिश्र (कानपुर) पं. दयाशंकर मिश्र , पं. हरिनारायण चतुर्वेदी, पं. सुनील दीक्षित, पं. रामनरेश उपाध्याय थे । स्मारिका ब्रह्म जागृति का विमोचन पं. महेश चन्द्र शर्मा ने किया ।
समारोह में 25 मेघावी छात्र छात्रों एवं 11 वृध्दजनों तथा बाहर से विभिन्न ब्राह्मण संगठनों के पदाधिकारियों का मार्ल्यापण कर अंगवस्त्र तथा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया । समारोह के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय महामंत्री पं. महेश कुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि समाज के कार्यक्रमों में युवा वर्ग खुलकर अपना उत्तरदायित्व क्यों नहीं निभाता । read more »
पांचवा श्रृंगार - शादी का जोड़ा : उत्तर भारत में आम तौर से शादी के वक्त दुल्हन के काम से सुसज्जित शादी कातकाजा गलग जोड़ा (घाघरा, चोली और ओढ़नी) पहनाई जाती है । इसी तरह महाराष्ट्र में हरा रंग शुभ माना जाता है और वहां शादी केवक्त वक्त दुल्हन हरे रंग की साड़ी महाराष्ट्रियन शैली में बांधती है ।
छठा श्रृंगार - गजरा : दुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों कालाल रुद्मल न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार फीका सा लगता है ।
सातवां श्रृंगार - मांग टीका : मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला या स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है । ऐसी मान्यता है कि नववधू कोजरी टीका सिर के ठीक बीचों बीचा इसलिये पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और अपने जीवन में वह हमेशा बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सकें । read more »
हर समाज में कुछ ऐसी परम्पराएं हैं, जिसेक पीछे गहरी अर्थ एवं इतिहास छुपा होता है । शाकद्वीपीय मग भोजक ब्राह्मणों में एक गोत्र है सकरमण । सकरमण गोत्र कैसे बना, इस पर हम अलग से विचार करेंगे । जैसलमेर, पोकरण, फलोदी क्षेत्र में पुष्पकरणा ब्राह्मणों के न्यात, ओसर, नुखता कोई भी होता है । उस समय जब कड़ाई मे ंशकर डाली जाती है, तब सबसे पहले कढ़ाई में शक्कर की पतासी भरकर सकरमण गौत्र के मग भोजक ब्राह्मण द्वारा डाली जाती है ।
फिर न्याति के चौधरी उसमें डालते हैं यह परम्परा फलौदी में जहाँ अभी सकरमण परिवार के लोग रहते हैं । बदसतुर होती है । बाप, नोख, मलार, लोड़िया आदि में न्यात होने पर भी सकरमण मग भोजक को ले जाते हैं । यह परम्परा क्यों और कैसे किस राजा के काल से चालू हुई ? यह कहना कठिन है । इस पर खोज कि याजा सकता है ।
फलोदी निवासी मधुयाड़ा (रासोणी) श्री रामचन्द्र बहुत अनुभवी एवं गुणी, वयोवृध्द विद्वान है । श्री कमला पत्नी रामचन्द्र जी शांडिल्य की क्रिया 10.5.09 को समाज के गुणीजनों के आगे चर्चा के समय उन्होंने मुझे यह बताया कि एक बार इस क्षेत्र के किसी राजा के समय राजा पुष्करणा ब्राह्मणों से नाराज हो गया । उसने न्यात के चौधरियों को जैल मे ंडाल दिया। किसी को देश निकाला दे दिया । किसी को मारा, पीटा वृत बाड़ी भी बन्द करा दी । इस समय शंकरलाल जी नामक विद्वान कवि थे । read more »
सूर्य विज्ञान समम्मत देवता है । सूर्यदेव ही लोकजीवन के साक्षी और सांसारिक प्राणियों की ऑंखों को प्रकाश देने वाले हैं । इसलिए, उनको लोकसाक्षी और जगच्चक्षु कहा गया है । निरूक्त के अनुसार वह आकाश में परिभ्रमण करने के कारण ही सूर्य की संज्ञा प्राप्त करते हैं । वही लोक को कर्म की ओर प्रेरित करते हैं तथा लोकरक्षक होने से ही रवि के नाम से उद्धोषित होते हैं ।
प्राचीन वैदिक ऋषि मुनि से आधुनिक वैज्ञानिक तक सूर्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों से सम्यक्तया परिचित रहे हैं । इसलिए सूर्य से भावघनिष्ठ संपर्क स्थापित करने के निमित्ति उन्होंने सूर्योपासना को विश्वधर्म और संस्कृति का अनिवार्य अंग बना दिया । फलत: सूर्य सम्पूर्ण विश्व के लिए अधिष्ठातृदेव के रूप में अंगीकृत हो गये । रोग के जीवाणुओं के शमन के लिए तो सूर्यकिरणों की उपयोगिता चिकित्साशास्त्र सम्मत है । आरोग्य कामना, निर्धनता निवारण, सन्तति प्राप्ति आदि की दृष्टि से तो सूर्य की पूजा और उनके स्तोत्रों के पाठ का व्यापक प्रचलन है ।
कर्मकाण्ड और तन्त्राचार या आगमिक पध्दति में सूर्य को प्रथमपूज्य देव की प्रतिष्ठा प्राप्त है । सूर्य की अर्ध्य निवेदित करने के बाद ही दैवकार्य या पितृकार्य का विधान सर्वमान्य है । योगासनों में भी सूर्य नमस्कार का अतिशय महत्व है । इस प्रकार, सूर्य निस्सन्देह जागतिक जीवों के प्राणपोषक, सर्वसम्प्रदाय सम्मत, लोकतान्त्रिक अजातशत्रु देता है । शास्त्र पुराणों में ऐसा निर्देश है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करता है , वह हजार जन्मों में भी दरिद्र नहीं होता । read more »
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